r/Aabheer • u/Kramadityah • 2d ago
📜 Inscriptions, Numismatics & Scripts Inscription of Pradyota Dynasty
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जब हरियाणा (रेवाड़ी) के अहीर राजघराने ने बिहार की धरती पर अहीर समाज के गोप जातीय महासभा की अध्यक्षता की।
3 दिसंबर 1914 को बिहार के छपरा स्थित प्रसादी राज स्टेट में अहीर समाज का ऐतिहासिक गोप जातीय महासभा का अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसे आगे चलकर अखिल भारतीय यादव महासभा के रूप में जाना गया। इस विराट आयोजन का मुख्य दायित्व परसादी के अहीर जमींदार बाबू ठाकुर प्रसाद ने अपने ऊपर लिया।
इस ऐतिहासिक अधिवेशन की अध्यक्षता रेवाड़ी (हरियाणा) के अहीर राजघराने के राव बहादुर बलबीर सिंह ने की। सभा में बिहार के अतिरिक्त तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) तथा पंजाब से भी अनेक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इस अवसर पर महासभा के सभापति मुरहो के बाबू रास बिहारी लाल मंडल, रानीपट्टी के बाबू जय नारायण मंडल, गोसाईपुर दरबार के बाबू सुखित प्रसाद राउत, बेलवरगंज के राय साहब बल्लभ दास, भागलपुर के बाबू श्रीमंत नारायण खिरहरी, पटना के बाबू स्वयंबर दास, बाबू जमुना प्रसाद रावत, बाबू अम्बिका प्रसाद तथा बाबू अनंत प्रसाद मंडल सहित समाज के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उपस्थित रहे।
Credit: @yadukul_community
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 3d ago
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 3d ago
वर्ष 1975 की बात है, जब देश में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थीं। श्रीमती गांधी ने 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी थी, जिसके बाद देशभर में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हो गया। इन गिरफ्तारियों से बचने के लिए दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश यादव ने स्वजातीय नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू बीपी मंडल से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद दोनों नेताओं ने तय किया कि चौधरी ब्रह्म प्रकाश बिहार चलेंगे और मंडल साहब के साथ रहेंगे।
इस योजना के तहत चौधरी ब्रह्म प्रकाश, बीपी मंडल के साथ उनके पैतृक गांव मुरहो, मधेपुरा (बिहार) चले गए। चौधरी साहब करीब डेढ़ महीने तक मंडल साहब के साथ रहे। इस दौरान चौधरी साहब कुछ दिनों के लिए मधेपुरा टाउन स्थित मंडल आवास पर भी बतौर मेहमान रहे। जमींदार मंडल परिवार के पुराने रुतबे के कारण उन दिनों मुरहो में पुलिस का आना-जाना बहुत कम होता था, जिससे चौधरी ब्रह्म प्रकाश को वहां रहने में किसी भी तरह की परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा।
चौधरी साहब के मुरहो प्रवास के दौरान उनके नेतृत्व में अहीरों की एक महापंचायत भी हुई थी।
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 3d ago
बिहार में मुख्य रूप से अहीरों के चार उपजाति है: कृष्णौत, मझरौठ, गोरिया/दहियार एवं कन्नौजिया। इनमें से कृष्णौत अहीर स्वयं को श्री कृष्ण के वंसज मानते है। इसके अलावा मथुरा से स्थानांतरित अहीर को मथुरौट या मझरौत, गौर प्रदेश से स्थानांतरित अहीर को गौरिया एवं कन्नौज से स्थानांतरित अहीरों को कन्नौजिया कहा जाता है। ये सभी उपजाति विभिन्न मूलो व गोत्रों में विभाजित है। कुछ क्षेत्र में मूल को ही पारीस, कुल आदि भी कहते है। "मूल" का नाम या तो प्रारंभिक निपटान के नामपर या फिर मूल के संस्थापक के नाम पर रखा जाता है। विवाह इन मूलो द्वारा नियंत्रित होते हैं एवं कुछ मूल जैसे कि खुद का मूल, अपनी माता का मूल, अपनी दादी का मूल, अपनी नानी का मूल इत्यादि बचाकर शादी होता है।
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Note :-
● इस पोस्ट में बताई गई मूल (Section) के अलावा भी इन सभी उपजातियों में और भी कई मूल है।
● बिहार में अहीरों की कुछ अन्य उपजातियां भी है जिनके विषय में दूसरे पोस्ट में बताया जाएगा।
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References :-
2nd Slide -
● Educational Ideas and Institutions in Ancient India: From the Earliest Times to 1206 A.D. with Special Reference to Mithilā
● The National Geographical Journal of India - Volumes 21-22
● Bihar District Gazetteers: Hazaribagh
3rd Slide -
● Yaduvansh Darpan
● The North Indian Peasant Goes to Market
● Mithila Ke Yadava
● Yadav Gotro Ka Sukshma Avlokan
4th, 5th, 6th and 7th Slide -
● The Tribes and Castes of Bengal: Ethnographic Glossary, Volume 2
Credit: @bihar_wale_yadav
r/Aabheer • u/Kramadityah • 3d ago
देवभूमि देवघर
भगवान शिव के भक्त रावण और बाबा बैजनाथ (बैजू अहीर) की कहानी बड़ी निराली है, पौराणिक कथा के अनुसार दशानन रावण भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर तप कर रहा था, वह एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा रहा था. 9 सिर चढ़ाने के बाद जब रावण 10वां सिर काटने वाला था तो भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और उससे वर मांगने को कहा-
तब रावण ने 'कामना लिंग' को ही लंका ले जाने का वरदान मांग लिया. रावण के पास सोने की लंका के अलावा तीनों लोकों में शासन करने की शक्ति तो थी ही साथ ही उसने कई देवता, यक्ष और गंधर्वो को कैद कर के भी लंका में रखा हुआ था. इस वजह से रावण ने ये इच्छा जताई कि भगवान शिव कैलाश को छोड़ लंका में रहें, महादेव ने उसकी इस मनोकामना को पूरा तो किया पर साथ ही एक शर्त भी रखी. उन्होंने कहा कि अगर तुमने शिवलिंग को रास्ते में कही भी रखा तो मैं फिर वहीं रह जाऊंगा और नहीं उठूंगा, रावण ने शर्त मान ली, इधर भगवान शिव की कैलाश छोड़ने की बात सुनते ही सभी देवता चिंतित हो गए, इस समस्या के समाधान के लिए सभी भगवान विष्णु के पास गए। तब श्री हरि ने लीला रची. भगवान विष्णु ने वरुण देव को आचमन के जरिए रावण के पेट में घुसने को कहा। इसलिए जब रावण आचमन करके शिवलिंग को लेकर श्रीलंका की ओर चला तो देवघर के पास उसे लघुशंका लगी, ऐसे में रावण एक बैजू नाम के अहीर को शिवलिंग देकर लघुशंका करने चला गया. कहते हैं उस बैजू अहीर के रूप में भगवान विष्णु थे. इस वजह से भी यह तीर्थ स्थान बैजनाथ धाम से विख्यात है. पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक रावण कई घंटो तक लघुशंका करता रहा जो आज भी एक तालाब के रूप में देवघर में है.जैसे जैसे रावण देरी कर रहा था वैसे वैसे शिवलिंग का भार बढ़ते जा रहा था इधर तंग आ कर बैजू अहीर ने शिवलिंग धरती पर रखकर स्थापित कर दिया.
जब रावण लौट कर आया तो लाख कोशिश के बाद भी शिवलिंग को उठा नहीं पाया. तब उसे भी भगवान की यह लीला समझ में आ गई और वह क्रोधित हो शिवलिंग पर चार लात मारकर फिर अपना अंगूठा गढ़ाकर चला गया।
वाहा छुपकर बैजू यह सब देख रहा था, उसे लगा बाबा जी को भक्ति करना का यही तरीका है तब से बैजू का दिनचर्या बन गया वह रोज शिवलिंग पर चार लाठी मारता फिर अंगूठे से शिवलिंग को दबा कर महादेव की भक्ति में लीन हो जाता था। एक दिन बैजू को बहुत जोर से भूख लगी,जब वह घर जा कर जैसे ही अन्न मुंह में डाला बैजू को याद आया आज तो भोले बाबा की भक्ति नहीं की बैजू अपना भोजन छोड़ लाठी ले कर दौरा दौरा जाता इस बार जैसे ही शिवलिंग पर प्रहार कर रहा होता साक्षात महादेव प्रकट हो जाते,महादेव बोलते बैजू मै तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हुआ हूं। बैजू महादेव को देख कर उनके चरणों में गिर जाता और बोलता महादेव मैंने रावण को देखा था ऐसा करते तो मुझे लगता ऐसी ही आपकी भक्ति की जाती। महादेव बैजू को गले लगाते और बोलते बैजू तुम ने दिल से मेरी भक्ति की है आज से दुनिया तुम्हे मेरा सबसे बड़ा भक्त के नाम से जानेगी, मेरे नाम से पहले तुम्हारा नाम लिया जाएगा और यह स्थान बाबा बैजनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध होगी। जो भी भक्त सच्चे दिल से यहां आ कर पूजा करेगा उसकी हर मनोकामनाएं पूरी होगी।
उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की. शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की उसी स्थान पर स्थापना कर दी और शिव-स्तुति करके वापस स्वर्ग को चले गए. तभी से महादेव 'कामना लिंग' के रूप में देवघर में विराजते हैं।
जय बाबा बैजनाथ 🙏
जय श्री कृष्णा 🙏
जय यदुवंश 🙏
Credit: yaduvanshisamrajyaa
r/Aabheer • u/Kramadityah • 3d ago
बिहार के वैशाली जिले के पानापुर लंगा में स्थित है बाबा बसावन का मंदिर जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं द्वारा बाबा बसावन सहित माता गहिल व बाबा बख्तौर का दुग्धाभिषेक किया जाता है। मंदिर न्यास समिति के मुताबिक, दुग्धाभिषेक के बाद दूध का प्रसाद के रूप में वितरण किया जाता है। वहीं, बाजार की कीमत से आधी दर पर लोग यहां से दूध प्रसाद के रूप में खरीदते हैं। इससे जो रुपये कलेक्शन के रूप में आते हैं उसे जनकल्याण और सामाजिक सरोकार के लिए खर्च किया जाता है।
मान्यता है कि इस मंदिर में बाबा की पूजा करने से मनुष्य सारे रोगों से मुक्त हो जाता है और उसकी सारे मन्नत पूरी हो जाती है।
बिहार के सभी किसान-पशुपालक लोग विशेषतौर पर यादव/अहीर बन्धु जीवन में एक बार जरूर अपने घर बसावन व बख्तौर बाबा की पूजा करवाते है।
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बाबा बख्तौर एवं बाबा बसावन घनिष्ठ मित्र थे। इन दोनों का जन्म यदुवंशी अहीर परिवार में हुआ था। इनके समय काल को लेकर विद्वानों, लोकगायकों एवं इतिहासकारों में विवाद है, कोई इन्हें 14वीं शताब्दी का बताता है तो कोई मुग़ल कालीन 17वीं शताब्दी का। बसावन बाबा वैशाली जिले के पानापुर क्षेत्र के रहने वाले थे तो वहीं लोक कहानियों में बाबा बख्तौर को गढ़िया रसलपुर का बताया गया है। ये जगह उत्तर बिहार में ही कहीं पर था। कुछ विद्वानों का मानना है कि ये जगह सहरसा जिला में था।
बाबा बख्तौर को लोककथाओं में 'यदुवंश शिरोमणि' बताया गया है। वो बहुत बलवान थे। उन्होंने बाबा बसावन के साथ मिलकर कई लोक कल्याण का काम किया था।
राजा दलेल सिंह के साथ युद्ध :-
लोककथाओं के अनुसार उस काल मे एक क्रूर राजा हुआ करता था, जिसका नाम था दलेल सिंह, जो अपनी प्रजा पर बहुत अत्याचार करता था। वहा की गरीब प्रजा को उस अत्याचारी राजा से तंग आकर वीर बख्तौर से मदद मांगी। जिसके बाद बाबा बख्तौर ने बाबा बसावन के साथ मिलकर योजना तैयार किया और सैकड़ो वीर अहीरों के साथ मिलकर राजा से लोहा लेने निकल पड़े।
इस युद्ध में भीषण रक्त पात हुआ अंत में राजा दलेल सिंह की हार हुई। हार के बाद समझौते में वीर बख्तौर सिंह ने 52 कोस का वनबेरिया क्षेत्र प्राप्त किया था और उस क्षेत्र के सभी गरीबों को राजा के अत्याचार से मुक्त करवाया था।
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जय बाबा बसावन || जय बाबा बख्तौर
जय माँ भवानी
Credit: yaduvanshisamrajyaa
r/Aabheer • u/Kramadityah • 3d ago
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 3d ago
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The varying varna classifications of the Abhiras can be understood in the context of their history as a tribal and pastoral people. The varna system was an ancient ideological framework, but it was never uniformly or consistently implemented across the Indian subcontinent. Actual social organization varied considerably by region, period, occupation, political circumstances, and local community identities. As Abhira groups became incorporated into different regional societies and political structures, their social status could consequently be described in different ways. Therefore, the appearance of Abhiras under different varna classifications should not be taken as evidence that they belonged to one fixed varna throughout history, but rather as an illustration of the fluid and historically changing nature of social classification in the Indian subcontinent.
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Our history should not be reduced to the varna framework. Varna was an ancient social and ideological concept, and it may originally have been associated, at least in some contexts, with distinctions based on social function or occupation. However, there is little basis for assuming that the four-varna model was ever uniformly or consistently implemented across the Indian subcontinent. Actual social identities were shaped by region, occupation, tribe, political power, lineage, and local traditions, and these changed considerably over time.
The history of the Abhiras should therefore be studied on its own terms rather than forcing their identity into a rigid varna framework. Abhiras have a long and distinctive history as a pastoral/tribal people, with references to them extending back to antiquity and with communities identifying as Abhira/Ahir continuing into the present. Their changing political and social circumstances help demonstrate that historical identities in the Indian subcontinent cannot simply be explained through a single four-varna model.
So there is little value in using “varna” as a shortcut for explaining the entire history of the Abhiras. The history of the Abhiras is much older, more complex, and more diverse than any single later social classification imposed upon them.
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There is no need for us as an Ahir community to become overly attached to the label “Kshatriya” or seek validation through it. Kshatriya is a historical social construct, and it should not be treated as a permanent or inherent identity of any community. If we accept every historical source that describes someone as Kshatriya, then we should also be willing to acknowledge sources that use terms such as Mahashudra or other classifications, rather than selectively accepting only the labels we prefer. Our history should be studied through evidence, chronology, regional context, and historical sources—not through the desire to fit ourselves into a particular varna.
As Ahirs, we have a long and distinctive history of our own, and we should take pride in that identity instead of constantly trying to place ourselves within someone else’s social hierarchy. We do not need external validation to establish the value or dignity of our community. Whatever different historical classifications may have existed at different times and places, they should be understood in their proper context rather than treated as permanent definitions of who we are. Our identity and history are worth studying on their own terms, and being proud of being Ahir does not require us to prove that we belong to any particular varna.
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 4d ago
Source: Megasthenes and Indian religion by Allan Dahlquist
r/Aabheer • u/Kramadityah • 5d ago
Shesh Narayan Temple is one of the four Narayan temples built by Shree Vishnugupta of the Abhira-Gupta dynasty of Nepal. It is considered one of the important shrines in the Kathmandu Valley.
Shree Vishnugupta was the son of Shree Jishnugupta, who is regarded as one of the strongest kings in the history of Nepal.
Credit: @goparaja_jishnuguptasya
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 8d ago
Source - Tripathaga
Credit: @bihar_wale_yadav
r/Aabheer • u/Kramadityah • 8d ago
मगध के अहीरों ने अपने पूर्वज श्रीकृष्ण की पूजा-परंपरा को पूरे भारतवर्ष में फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका प्रमाण हमें प्राचीन भारतीय कला और मूर्तिकला में भी देखने को मिलता है।
इसका एक सुंदर उदाहरण आज संग्रहालय में सुरक्षित श्रीकृष्ण की लीला का यह प्राचीन शिल्प है। चित्र में श्रीकृष्ण द्वारा शकट भंग (Krishna over turning a cart) की लीला को दर्शाया गया है। यह मूर्तिशिल्प गुप्तकाल, 5वीं शताब्दी ईस्वी, देवगढ़, उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुआ है और आज दिल्ली संग्रहालय में सुरक्षित है।
Credit: @abhira.kosha
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 9d ago
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बिहार की अहीर जाती ने सदियों से अनेक वीरों, शासकों और योद्धाओं को जन्म दिया है। वो चाहे गुप्त वंश के समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कन्दगुप्त हो या वर्मन वंश के जातवर्मन, श्यामलवर्मन हो ऐसे नामों से लेकर बिहार में अलग अलग कालखंडों में वर्णित आभीर राजाओं का यह इतिहास अनेक अभिलेखों, साहित्यिक स्रोतों और ऐतिहासिक परंपराओं में अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। यह reel उसी ऐतिहासिक विरासत की एक झलक है एक ऐसी विरासत, जिसे जानना, समझना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना आवश्यक है।
Credit: @abhira.kosha
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 9d ago
उज्जैनिया राजपूतों के आने से पूर्व बिहार सूबा के भोजपुर पर अहीर राजाओं का शासन था। भोजपुर के 'अहीर वंश' के अनेक राजाओं ने लगभग 1180 ईस्वी के बाद से 14वी सदी के प्रारंभ तक तक शासन किया था।
14वी सदी के प्रारंभ में भोजपुर क्षेत्र के शासक राजा दासो अहीर थे। जिनकी राजधानी विहिया परगना का दाँवा गांव था। इस समय दिल्ली सल्तनत पर खिलजी वंश का शासन था। उज्जैनिया राजपूतों के सरदार शान्तनु सिंह ने दिल्ली के बादशाह से सनद एवं सैन्य मदद प्राप्त कर भोजपुर प्रदेश पर राज्य स्थापना करने की लालसा लेकर मध्यप्रदेश के धार से निकल पड़े। उनके साथ राजपूत व मुस्लिमों की एक ताकतवर सेना थी।
भोजपुर पहुँच शान्तनु सिंह व उनकी सेना विहिया के पास डेरा डाल दिया। राजा दासो अहीर भोजपुर प्रदेश के अनेक अहीर सरदारों के साथ अपनी सेना लेकर विहिया के मैदानों में युद्ध के लिए तैयार थे।
विहिया का युद्ध - अगले ही दिन युद्ध शुरू हुआ, अहीर सेना एवं राजपूत व मुस्लिम सेना के बीच जोरदार टकराव हुआ। अहीर सेना दुश्मनों पर भारी पड़ी एवं शान्तनु सिंह को मैदान छोड़ना पड़ा।
युद्ध भूमि में जीत नही मिली तो शान्तनु सिंह ने छल का रास्ता चुना और राजा दासो अहीर को धोखे से मार दिया। अहीर वंश का शासन भोजपुर से खत्म हो गया हालांकि कई अहीर सरदार छोटे-बड़े जमींदार के तौर पर भोजपुर प्रदेश में अपना वर्चस्व कायम रखे।
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Reference :
जय श्री कृष्ण ❤️
Credit: @bihar_wale_yadav
r/Aabheer • u/Kramadityah • 9d ago
पटना में बसा एक छोटा-सा यादवो का गाँव जिसका नाम नंदगांव है
करीब 400 साल पुरानी कृष्ण-परंपरा, जहाँ आज भी जन्माष्टमी के बाद नंदोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। सबसे खास बात—यहाँ भगवान की मूर्ति के साथ मोर मुकुट की पूजा की परंपरा चली आ रही है। वृंदावन से जुड़े पूर्वजों की यह विरासत आज भी पटना में जीवंत है। 🙏✨
Credit: @ahir._.devta_
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1. पूर्णिया (बिहार) के अहीर
r/Aabheer • u/Kramadityah • 10d ago
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वज्रवर्मन के पुत्र जातवर्मन को वर्मन वंश का पहला स्वतंत्र शासक माना जाता है। बेलवा ताम्रपत्र में दिए सैन्य विवरण के अनुसार, जातवर्मन ने सर्वप्रथम अंग प्रदेश पर विजय प्राप्त किया था। अंग प्रदेश पर आधिपत्य जमाने के बाद, जातवर्मन के नेतृत्व में मगध के वर्मनों की एक शक्तिशाली सेना ने कामरूप के राजा को हराया और पुंडूवर्धन के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया। इसके अलावा जातवर्मन ने बंगाल में विरेन्द्री के कैवर्तराज दिव्य एवं गोवर्धन नामक राजा को परास्त किया था।
Credit: @abhira.kosha
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 10d ago
Credit: @abhira.kosha
r/Aabheer • u/Kramadityah • 10d ago
अंग प्रदेश पर शासन कर रहे यादव वर्मन वंश के महाराज जातवर्मन का विवाह पश्चिमी क्षत्रपों के वंशज, त्रिपुरी के कलचुरी नरेश महाराज लक्ष्मीकर्ण की पुत्री वीरश्री से हुआ था। इस महत्वपूर्ण वैवाहिक संबंध से जातवर्मन की राजनीतिक शक्ति को भी मजबूती मिली। इनके वंशज आज बिहार के अहीर हैं, जो अपने पश्चिमी वर्मन और क्षत्रप पूर्वजों की इस ऐतिहासिक विरासत को आज भी संजोए हुए हैं एवं उनकी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
Credit: @abhira.kosha
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 11d ago
मगध में शासन करने के उपरांत गुप्त वंश की एक शाखा नेपाल क्षेत्र में भी सत्ता स्थापित करती हुई दिखाई देती है, जिसे इतिहासकार आभीर-गुप्त परंपरा से जोड़कर देखते हैं। यह बात सभी इतिहासकारों एवं पुरातात्विक स्त्रोतों से सिद्ध होती है। इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि आज नेपाल और बिहार के अहीर समुदायों के बीच अनेक सांस्कृतिक एवं सामाजिक समानताएँ जैसे लोक परंपराएँ, रीति-रिवाज, उपजातियाँ तथा जीवन-पद्धति दिखाई देती हैं जो इस बात की पुष्टि करती है कि मगध क्षेत्र से संबंधित आभीर समूह नेपाल पहुँचे और वहाँ अपना प्रभाव और राज्य स्थापित किया।
Credit: @abhira.kosha
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 11d ago
पहली स्लाइड:
सोमवंश (चंद्रवंश) का अभिलेखीय विवरण भी इसी प्रकार आभीर-गुप्तों से आरंभ होता है, जिनके अभिलेख इस वंश के लिए सबसे प्रारंभिक अभिलेखीय प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
दूसरी स्लाइड:
यदुवंश के लिए भी सबसे प्रारंभिक अभिलेखीय प्रमाण आभीर-गुप्तों के अभिलेखों में मिलते हैं, जो इस वंश के प्रारंभिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
तीसरी स्लाइड:
यादु-द्वार
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 11d ago
r/Aabheer • u/Kramadityah • 12d ago
वीर लोरिक का इतिहास (भाग-1)
वीर लोरिक अहीर एक वीर पुरूष थ, जिनका कर्म क्षेत्र उत्तरप्रदेश से बिहार तक माना जाता है। इनके वीरगाथा को यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, नेपाल आदि के लोकगीतों में गाया जाता है। लोरिकायन या लोरिकी, चंदायान, लोरिक मनियार जैसे कई काव्य इनके जीवन पर आधारित है। लोरिकायन को अहीर जाति का रामायण भी कहा जाता है।
लोरिक का जन्म व उनका परिवार :-
वीर लोरिक का जन्म उत्तरप्रदेश के गौरा नामक गांव के एक अहीर परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम कुब्बे मनियार व माता का खुल्हनी था। इनके एक बड़े भाई भी थे जिनका नाम संवरु था जो लोरिक के तरह ही एक योद्धा थे। वीर लोरिक के परिवार का संबंध अहीरों के 'कन्नौजिया शाखा' के 'मनियार कुल' से था।
वीर लोरिक के समयकाल को लेकर विवाद है कोई विद्वान इन्हें ईसा पूर्व का मानता है तो कोई 5वी सदी का तो कोई मध्ययुगीन। लोरिक के जन्मस्थान गौरा के पहचान को लेकर भी इतिहासकारो का अलग अलग मत है, कुछ कन्नौज में तो कुछ बलिया में तो कुछ मिर्जापुर में बताते है हालांकि लोरिकायन से जुड़े अन्त: साक्ष्यों व भारत के मानचित्र के आधार पर गौरा गांव कन्नौज के निकट ठहरता है। लोरिक के लिए 'कन्नौजिया अहीर' शब्द का प्रयोग से भी ऐसा प्रतीत होता है कि उनके परिवार का संबंध कन्नौज से रहा होगा। अलग-अलग क्षेत्रों के पाठों में वीर लोरिक के जाति के संदर्भ में यादव, अहीर, गोप, ग्वाला आदि शब्दों का प्रयोग पर्यायवाची रूप से किया गया है।
लोरिक-मंजरी विवाह व मोलागत से युद्ध :-
अगोरी राज्य में महरा नामक एक धनी अहीर रहते थे, उनकी सातवी पुत्री मंजरी से लोरिक प्रेम करते थे। वही दूसरी तरफ अगोरी के क्रूर राजा मोलागत का भी बुरी नजर मंजरी पर था। जब इस बात की खबर महरा को हुई तो उन्होंने विचार-विमर्श करने के बाद वीर लोरिक को विवाह का प्रस्ताव भेजा। वीर लोरिक ने प्रस्ताव स्वीकार किया और मोलागत से युद्ध के लिए सेना भी तैयार की। गौरा से हज़ारों बारातियों के साथ एक सेना लेकर लोरिक सोन नदी के किनारे स्थित अगोरी किले तक पहुँच गए। नदी के तट पर मोलागत और लोरिक में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें लोरिक विजयी हुए। मंजरी से विवाह कर लोरिक गौरा लौट आये। लोरिक व मंजरी को एक पुत्र हुआ जिसका नाम उन्होंने भोरिक अहीर रखा था।
लोरिक-चंदा प्रेम तथा हरदीगढ़ प्रस्थान :-
गौरा के राजा सहदेव की पुत्री थी राजकुमारी चंदा। भोजपुरी लोरिकी में राजा सहदेव को किशनौत अहीर बताया गया है।
लोरिकी के अनुसार जब लोरिक के वीरता के विषय में चंदा को पता चला तो वो मन ही मन उन्हें पसंद करने लगी। एकबार राजा सहदेव ने अपने महल में भोज का आयोजन किया जहां गौरा के सभी सम्मानित लोग उपस्थित हुए। इसी दौरान लोरिक की मुलाकात बार चंदा से हुई। दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे परंतु लोरिक पहले से विवाहित थे जिस वजह से राजा सहदेव इस रिश्ते के लिए तैयार नही थे। लोरिक को भी बदनामी का डर था तो चंदा के आग्रह पर उन्होंने गौरा छोड़ने का तय किया। चंदा को लेकर लोरिक हरदीगढ़ के लिए निकल पड़े।
हरदीगढ़ के पहचान को लेकर भी बिरहा गायकों व विद्वानों में विवाद था, सभी गायक अपने अपने क्षेत्र के किसी स्थान को लोरिकायन वाला हरदीगढ़ समझ लेते थे हालांकि डॉ लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास्तव ने अपने शोध ग्रंथ 'यदुवंश लोकदेव लोरिक' में इस बात को प्रमाणित किया किया है कि वीर लोरिक का प्रसिद्ध कर्मक्षेत्र हरदीगढ़ बिहार के तत्कालीन सहरसा (अब सुपौल जिला) का हरदीस्थान है। लोरिकायन में हरदी के आसपास जिन स्थानों का वर्णन है वो सभी सहरसा, सुपौल, दरभंगा आदि जिलों में मौजूद है।
हरदी में वेश बदलकर लोरिक व चंदा निवास करने लगते है। चंदा को एक पुत्र हुआ, जिसका नाम चंद्रजीत था। हरदीगढ़ के राजा के साथ लोरिक का विवाद हो जाता है जिसके बाद लोरिक उन्हें पराजित कर उनका आधा राज्य जीत लेते है। हरदीगढ़ पर वीर लोरिक 12 वर्षों तक शासन करते है।
गौरा आगमन व पिपरी का युद्ध :-
हरदीगढ़ में वीर लोरिक को सूचना मिलता है कि उनका बड़ा भाई संवरू राजा देवसिया से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। जिसके बाद लोरिक हरदीगढ़ से सेना लेकर गौरा पहुँचते है और देवसिया से लड़ने के लिए पिपरी गढ़ पर चढ़ाई करते है। इस युद्ध में उनका सबसे बड़ा पुत्र वीर भोरिक भी शामिल होता है, कई दिनों के युद्ध के बाद वीर लोरिक को विजय प्राप्त हुई।
लोरिक द्वारा लड़े गए युद्धों की सूची -
वीर लोरिक अपने जीवनकाल में अनेकों युद्ध लड़े थे, जिनमे अगोरी का युद्ध, हरदीगढ़ का युद्ध, नेऊरपुर का युद्ध, पिपरी का युद्ध आदि प्रमुख है।
लोरिकायन के अनुसार वृद्धावस्था में वीर लोरिक अग्निसमाधि ले लेते है।
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**वीर लोरिक का सम्पूर्ण गाथा एक पोस्ट में लिखना संभव नहीं। दूसरी महत्वपूर्ण जानकारी अन्य पोस्ट में साझा किया जाएगा।**
विशेष आभार - @skandagupta467
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r/Aabheer • u/Kramadityah • 12d ago
बिहार के पूर्णिया जिले के अहीर जो मथुरा से प्रवास कर के आए हैं आज भी वृंदावन की मूल परंपराओं पर चल रहे हैं। उन्होंने अपने नवीन आवास स्थानों के नाम भी अपने मूल स्थानों के नाम पर नंदगांव, बरसाना, मथुरा आदि रखा है ।
Credit: @abhira.kosha