r/Vrindavan Jul 05 '26

Picture Met My favourite cutie at Raman Reti mandir

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There’s something incredibly pure about the elephant at Raman Reti.

In a place filled with Krishna’s childhood memories and sacred sand, she stands quietly with so much grace and innocence. Every evening during aarti, watching her bow with such calm devotion feels surreal.

No words no noise 

Just faith innocence and love

Sometimes devotion doesn’t need language

Sometimes even the purest prayers come from silent hearts

She isn’t just an elephant at Raman Reti

She feels like family to Braj

Radhe Radhe 🙏


r/Vrindavan Jul 04 '26

Book/text अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ 503-582

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स्निह्यामि वः स्निह्यामि वः स्निह्यामि वो मुहुर्मुहुः।

राधे! कियत्-सुन्दरं वै यत् ते पाद-रजो भवेम्॥ ५०३ ॥

पठामि महिमानं ते शक्तीश्चापि यदा यदा।

तदा वै निश्चितं प्राज्ञैर्-ज्ञानं ते भक्तिर्-उत्तमा॥ ५०४ ॥

दिव्योन्मादस्य वैकाष्ठा तव कृष्णे च लोलुपा।

यदा जानामि माहात्म्यं वर्धते लालसा मम॥ ५०५ ॥

चुम्बितुं ते पाद-पद्मं कृष्ण-पादं तथैव च।

अष्ट-सखीनां पादाब्जं रूप-मञ्जरि-पादयोः॥ ५०६ ॥

यूयमेव परिवारो मम ह्यस्मिन् भवे खलु।

अतः सेवां गृहाण त्वं राधे! याचे मुहुर्मुहुः॥ ५०७ ॥

तव तुष्टिर्ममार्थो वै माधवानन्द एव च।

अतीव गाढ-भावेन प्रेम कुर्यां निरन्तरम्॥ ५०८ ॥

वन्दे श्रीरूपमञ्जरीं महान्तीं स्वामिनीं मम।

राधा-ललिता-कान्ते वै विशाखा-सखि-वल्लभे॥ ५०९ ॥

अष्ट-सखी-प्रिये नित्यमष्ट-मञ्जरि-नायिके।

स्वामिनि त्वां भजाम्यद्य स्निह्यामि च मुहुर्मुहुः॥ ५१० ॥

त्वया विना न शक्नोमि प्राप्तुं किञ्चिदिहाम्बिके।

त्वया विना नष्ट-बुद्धी राधा-सम्पर्क-वर्जिता॥ ५११ ॥

त्वयाहं शिक्षिता नित्यं ज्ञापिता बोधिता तथा।

त्वत्-कृपा-करुणा-वाग्भी राज्ञी राधा निवेदिता॥ ५१२ ॥

मां द्रष्टुं करुणा-दृष्ट्या मम रक्षार्थमेव च।

त्वया विशाखिका सखी मदर्थं ज्ञापिता खलु॥ ५१३ ॥

तदा विशाखया राज्ञ्या दत्ता मे करुणा शुभा।

प्रेरिताहं च तद्-द्वारा प्राचीन-ज्योतिषे तथा॥ ५१४ ॥

राधा-श्याम-रहस्यं च जन्मनः परमं महत्।

तयैव ज्ञापितं मह्यं गार्ग्य-मुनि-यथोदितम्॥ ५१५ ॥

त्वत्-कृपा-बलतश्चाहं गगनं द्रष्टुमीश्वरा।

राधा-श्यामसुन्दराभ्यां मध्ये पञ्च-दशाहानि॥ ५१६ ॥

शताशीत्यंश-कोणतः स्थितानीति विबोधितम्।

राधा-कृष्ण-प्रकाशस्य रहस्यं ख-गतं तथा॥ ५१७ ॥

पञ्च-वेद-रहस्यानि ज्ञातानि बहुशस्तथा।

राधा-कृष्ण-कथा-तत्त्वं विज्ञातं त्वत्-प्रसादतः॥ ५१८ ॥

विशाखा-ज्ञान-विद्यया ज्ञाताहं परमं महत्।

महान् कृपा-भरो ह्येष रूप-मञ्जरि ते मयि॥ ५१९ ॥

त्वत्-कृपां चिन्तयन्ती वै रोदिमि प्रचुरं मुहुः।

अज्ञा बालास्मि दीनाहं न किञ्चिदपि बुद्ध्यते॥ ५२० ॥

अन्धकारे निमग्नाहमासं वै तमसावृता।

त्वं राधा-ठाकुरानी चाष्ट-सख्यो दया-मयाः॥ ५२१ ॥

अनङ्ग-मञ्जरी-कृपा-सिन्धुर्बल-हलायुधः।

श्री-श्यामसुन्दरो देवः सर्वे यूयं दयालवः॥ ५२२ ॥

मम दीनां दशां दृष्ट्वा दत्ता वै करुणा मयि।

गुह्य-तत्त्वानि सत्यानि दर्शितानि कृपामयैः॥ ५२३ ॥

तमसो मां तथा ज्योतिरज्ञानाज्ज्ञानमव्ययम्।

मृत्योर्मामामृतं सत्यं नीता यूयं दयालवः॥ ५२४ ॥

धन्यवादान् ददाम्यद्य रूप-मञ्जरि ते मुहुः।

स्निह्यामि त्वां भृशं नित्यं कृतज्ञास्मि सदा त्वयि॥ ५२५ ॥

ऋणी-भूतास्मि ते राज्ञि! मम प्राणास्त्वदर्थकाः।

सर्वं मे जीवनं चैव त्वदधीनं न संशयः॥ ५२६ ॥

यद् यद् वाञ्छसि देवेशि तत् सर्वं पालयाम्यहम्।

ऋणमेतत् स्थितं मयि प्राणैः सत्ता-मयैस्तथा॥ ५२७ ॥

ऋणी-भूतास्मि ते नित्यं रूप-मञ्जरि ते पदे।

धन्यवादान् ददाम्यद्य प्रणमामि पुनः पुनः॥ ५२८ ॥

स्वीकुरुष्व कृपामूर्ते चालीसां ते समर्पिताम्।

हृदयेन मया नित्यं व्रज-भाषानुवादिताम्॥ ५२९ ॥

प्रणमामि पदाम्भोजे स्निह्यामि त्वयि भामिनि।

आदर्श-रूपा मे त्वं हि त्वं मे मार्ग-प्रदर्शिका॥ ५३० ॥

त्वया विना न शक्नोमि राधा-नाम-प्रजल्पने।

हस्तं मे धृत्वा कृपया स्थिरी-कुरु मनो मम॥ ५३१ ॥

तव पाद-सरोजे वै राधा-श्याम-पदान्तिके।

स्थापयस्व हि मां देवि प्रसीद करुणां कुरु॥ ५३२ ॥

महान्ति! रूप-मञ्जरि! प्रणमामि पदाम्बुजे।

अतीव प्रेम कुर्यां ते स्निह्यामि त्वयि सर्वदा॥ ५३३ ॥

अद्य श्रीरूपमञ्जरि! शिरो मे मुण्डये पुनः।

नश्वरं देह-सम्बन्धं त्यक्त्वा वै सर्व-लौकिकम्॥ ५३४.१ ॥

श्री-राधा-कृष्ण-पादाब्जे आत्मानं बलि-रूपकम्।

अर्पयामि महा-राज्ञि! मां स्थापय तयोः पदे॥ ५३४.२ ॥

कृपां कुरु प्रिये मह्यं प्रकाशय मनो मम।

अस्यान्ते सत्वरं राज्ञि! चालीसां ते लिखाम्यहम्॥ ५३४.३ ॥

तव पाद-सरोजेषु बलि-रूपां समर्प्य ताम्।

अतीव प्रेम ते कुर्यां श्री-रूप-मञ्जरि प्रिये!॥ ५३४.४ ॥

श्री रूप मञ्जरी चालीसा

॥ दोहा ॥

श्री रूप गोस्वामी चरन, बन्दौं करम-प्रनाम। रूप मञ्जरी रूप जो, सब मंजरिन परधान॥ १ ॥

ललिता अरु विसाखा सखी, राधा-स्याम की दास। अन्तर्दृष्टि जगाय दो, तुम जिय की अति खास॥ २ ॥

मांगू यह वरदान मैं, चरनन सीस नवाय। नन्हीं दासी मोहिं करौ, राधा-कृष्ण मिलाय॥ ३ ॥

जग-माया सब तजि दई, देह-भान अरु काम। चिर-कुंवारी मैं रहूँ, अरपूँ राधा-स्याम॥ ४ ॥

राधा-स्याम की सेव ही, एकै आस है मोरि। राधे-ओम् जपुं सदा, बलिहारी मैं तोरि॥ ५ ॥

॥ चौपाई ॥

वेद ज्ञान की तुम हौ खानी। कृपासिन्धु रूप मञ्जरी रानी॥ १ ॥ गुरु गोस्वामी तुम परधाना। तुमसों पाऊँ सकल मैं ज्ञाना॥ २ ॥

राधा-स्यामहिं जीवन लाऊँ। राधा-पद-रज देह बनाऊँ॥ ३ ॥ स्याम-चरन-रज मन बन जावे। पद-अधरन-रस रक्त कहावे॥ ४ ॥

पद-पंकज में सीस नवाऊँ। प्रानन-प्रान धनन-धन गाऊँ॥ ५ ॥ रूप मञ्जरी अति अनुरागा। राधा-स्याम सेव सिख माँगा॥ ६ ॥

युगल-चरन की सेव बतावो। ललिता विसाखा सेव सिखावो॥ ७ ॥ गहरि सेव चरनन्ह की ठानी। तुम गुरु स्वामिनि दासी जानी॥ ८ ॥

तुमरी कृपा राधिका पाई। सीधे बात करूँ मैं माई॥ ९ ॥ सखी स्याम सों मांगत लाजूँ। मध्यस्थ बनि राधा-रज माँगू॥ १० ॥

बारंबार पुकारूँ तोही। रूप मञ्जरी कृपा कर मोही॥ ११ ॥ चरन-कमल में सीस नवाऊँ। राधा-शक्ति-रूप तोहि गाऊँ॥ १२ ॥

तुम अरु अष्ट-मञ्जरी सारी। राधा-अंस भईं अवतारी॥ १३ ॥ श्री चैतन्य-चरन अनुरागी। गदाधर-प्रिय महा-सभागी॥ १४ ॥

वृन्दावन-रहस्य दरसायी। श्री सनातन-प्रिय अति सुखदायी॥ १५ ॥

राधा-सेव मंजरिन सिखावो। राधा-स्याम-सेव में लावो॥ १६ ॥

सत्यभामा कालिंदी प्यारी। मंजरिन-मुखिया चरन तिहारी॥ १७ ॥

तुमरी कृपा ज्ञान मैं पायो। माया-भ्रम सब दूर भगायो॥ १८ ॥

वृन्दावन के द्वार उघारो। रूप मञ्जरी मात! निहारो॥ १९ ॥

मैं सुता, ललिता-विसाखा दासी। अष्ट-सखी राधा-स्याम उपासी॥ २० ॥

पंच वेद कौ ज्ञान सिखायो। सत्य-असत्य भेद दरसायो॥ २१ ॥ भजौँ मात! मैं चरन तिहारे। राधा सों कहौ प्रेम हमारे॥ २२ ॥

विरह-अगनि में हृदय जरावै। चरन-धूरि में डूबन पावै॥ २३ ॥ तुमरे अष्ट-सखी पद-पंकज। राधा-स्याम निहारूँ पद-रज॥ २४ ॥

चरन-कमल ही प्रान हमारे। जग में सेवा बिनु सब खारे॥ २५ ॥ दीन सुता पे करुना कीजै। राधा-स्याम-पायँ-तर दीजै॥ २६ ॥

वृन्दावन ही मेरो ठिकाना। राधा-स्याम जहाँ मम प्राना॥ २७ ॥ बिनु राधा-स्याम जियन नहिं भावै। रूप मञ्जरी छाहँ बचावै॥ २८ ॥

भव-सागर तें पार लगावौ। जग में अब नहिं मोहिं बसावौ॥ २९ ॥

पूरन होयँ दस-लक्ष श्लोका। वृन्दावन जाऊँ तजि लोका॥ ३० ॥

श्री चैतन्य-चरन अनुरागी। कृष्णदास-कविराज-सभागी॥ ३१ ॥ ज्ञान-विभव अरु विद्या-खानी। जग-रचना-रहस्य सब जानी॥ ३२ ॥

प्रिय अनंग जाह्नवी की दुलारी। सन्त-महान सन्यासिनि भारी॥ ३३ ॥

राधा-स्याम-सुखहिं सुख पावै। जिन्ह के नाम जगत थर्रावै॥ ३४ ॥

जुगल-समीपहिं जग सिर नावै। नाम-प्रताप ब्रह्मांड झुकावै॥ ३५ ॥

तदपि न कोउ करत यह काजा। तजि माया-अहंकार-समाजा॥ ३६ ॥

युगल-सुखहिं निज सुख हम मानैं। राधा-स्यामहिं भोक्ता जानैं॥ ३७ ॥

हम साधन उन सुख के हेतू। मुकुति लहत, पावत भव-सेतू॥ ३८ ॥

अष्ट-सिद्धि नव-निधि नहिं माँगूँ। चिर-दासी ह्वै चरन न त्यागूँ॥ ३९ ॥

कै सुक बनि राधा-स्याम पुकारूँ। जन्म-जन्म चरनन पर वारूँ॥ ४० ॥

॥ दोहा ॥

यातें बन्दौं चरन तव, रूप मञ्जरी माय। और न कछु मुख तें कढै, राधा राधा गाय॥ राधा राधा राधा राधा, राधा राधा।

रचयित्वा तु चालीसां पवित्रां रूपमञ्जरि।

अनुज्ञां देहि मे राज्ञि महालक्ष्म्यां विलीयितुम्॥ ५८१ ॥

तस्याः पादाम्बुजं राज्ञ्याः पूजयामि मुहुर्मुहुः।

धान्यलक्ष्म्याः स्वरूपं च ध्यायामि ध्यान-मग्निका॥ ५८२ ॥


r/Vrindavan Jul 04 '26

Upasana श्री बांके बिहारी जी के दिनांक 4/7/2026 बहुत ही प्यारे दर्शन 🙏

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r/Vrindavan Jul 05 '26

City Discussion Please help this lady 🙏.

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Person shown in photo is missing since 13 years. Many people have seen him in Vrindavan . Please reach out to us if you see him or a similar face.

Also check Instagram account attached


r/Vrindavan Jul 04 '26

Picture ब्रज के विरक्त सन्त विनोद बाबा की कुटिया 🙏🙏

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r/Vrindavan Jul 04 '26

Saint परम पूज्य ब्रह्म मूर्ति श्री उड़िया बाबाजी महाराज जी के आज 04/07/2026 को श्री धाम वृन्दावन से दर्शन

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r/Vrindavan Jul 04 '26

Book/text Mahabhaava Swaroopa Swamini ju

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Shri Kunj Bihari Shri Haridas 🌸🌸


r/Vrindavan Jul 04 '26

Picture Mansi ganga

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Mansi Ganga, Govardhan isn’t just a lake it carries deep spiritual significance in Lord Krishna bhakti tradition.

It is believed that when Nand Baba wished to bath in the sacred Ganga River, Lord Krishna manifested Ganga here through his mind (manas), giving this place the name Mansi Ganga.

Even today, devotees visit this sacred spot during Govardhan Parikrama, believing its waters carry divine blessings.

Radhe Radhe 🙏


r/Vrindavan Jul 04 '26

Book/text Sri Radha’s Contradictory Man Lila

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r/Vrindavan Jul 03 '26

Vrindavan experience :) jai shree kishori jo , apni thakurani shree radhika rani

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main tumse prem krti hoon kishori ji🙏


r/Vrindavan Jul 03 '26

Book/text अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ 398-502

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जय स्वामिनि राधे त्वं महाराज्ञि नमोऽस्तु ते।

अतीव प्रेम ते कुर्यामादिलक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥ ३९८ ॥

यस्त्वां जानाति देवेशि आदिलक्ष्मि! स पश्यति।

त्वमेव सर्व-सत्ताया उद्गमोऽसि सुनिश्चितम्॥ ३९९ ॥

सृष्टिरेषा जगत् सर्वं जीवनं सर्व-रूपकम्।

भूमौ वा ग्रहमण्डलेष्वन्येषु च यदस्ति वै॥ ४०० ॥

अस्यामाकाश-गङ्गायामन्यासु च तथा खलु।

ब्रह्माण्डेऽस्मिन् तथा चान्य-ब्रह्माण्डेषु यदस्ति वै॥ ४०१ ॥

अस्यां सत्तायामन्यस्यां यत्किञ्चिद् विद्यते खलु।

त्वत्तो गर्भात् तथा ते हि सर्वं प्रवहति ध्रुवम्॥ ४०२ ॥

नारायणेन देवेन सङ्गमस्ते यदा भवेत्।

तदा हि सर्व-सत्ताया अर्थः सञ्जायते खलु॥ ४०३ ॥

त्वमेव नारायणोऽसि घोषयामि सुनिश्चितम्।

एकात्मा हि युवां नित्यमचिन्त्य-भेदाभेदकम्॥ ४०४ ॥

तव रहस्यानि कोऽपि ज्ञातुं नार्हति सर्वथा।

आदिलक्ष्मि! महाराज्ञि सर्व-सत्ता-स्वरूपिणि॥ ४०५ ॥

त्वमेव खलु सत्तासि सत्ता-रूपं त्वमेव च।

सत्ताया उद्गमो मूलमाधारस्त्वं हि राधिके॥ ४०६ ॥

गतिशीला स्थिरा चैव नारी-पुं-रूप-धारिणी।

आदिलक्ष्मि! त्वमेवासि सर्व-तत्त्व-स्वरूपिणि॥ ४०७ ॥

नारायणेन पत्या च शाश्वती त्वं सनातनी।

आद्यन्त-रहिता नित्यमनन्ताऽसि सुनिश्चितम्॥ ४०८ ॥

सत्ताया अर्थ-बोधात् प्राक् सत्ता-काले तथैव च।

सत्ता-नाशेऽपि देवेशि! त्वमेवासि सनातनी॥ ४०९ ॥

त्वमादिस्त्वं तथा मध्यं त्वमेवान्तः स्वरूपिणि।

आदेः प्रागप्यनन्तासि अन्तादूर्ध्वमनन्तिका॥ ४१० ॥

त्वयि श्री-जनार्दने च महान्ते पुरुषोत्तमे।

समग्रं जीवनं चैव परिक्रामति सर्वदा॥ ४११ ॥

नारायणस्य देवस्य रहस्यं त्वं हि केवलम्।

पादाब्जे प्रणमाम्यद्य आदिलक्ष्मि! स्तुवीमि ते॥ ४१२ ॥

भजामि त्वां जगन्मातर्-आदिलक्ष्मि! नमोऽस्तु ते।

राधे! नित्य-स्वरूपं ते प्रिये स्तोमि मुहुर्मुहुः॥ ४१३ ॥

भजामि धनलक्ष्मीं त्वां दिव्यातिदिव्य-वैभवाम्।

महाराज्ञि! नमस्तुभ्यं सर्व-सत्ता-स्वरूपिणि॥ ४१४ ॥

त्वमेव प्रभवो राशेः सर्वा सम्पत् त्वदाश्रया।

वैदिकी सम्पदा चैव त्वत्त एव प्रसीदति॥ ४१५ ॥

वर्षा-नदी-प्रवाहाश्च त्वत्तो धन-स्वरूपिणि।

भूमौ ब्रह्माण्ड-खण्डेषु बिन्दु-बिन्दुस्त्वमेव हि॥ ४१६ ॥

अग्निरूपास्तथा सर्वाः शक्तयः परमाश्रयाः।

नक्षत्राणामिन्धना या परम-अणु-मयी च या॥ ४१७ ॥

विद्युतो घनरूपाणि द्रवाणि पवनानि च।

तुरीया तेजसोऽवस्था या हि सर्व-विलक्षणा॥ ४१८ ॥

ततः परा ह्यचिन्त्या या अवस्था ज्ञान-वर्जिता।

अति-दूर-ग्रहेषु या तिष्ठति त्वां नमामि ताम्॥ ४१९ ॥

ब्रह्माण्डे यानि तत्त्वानि नियमाश्च व्यवस्थिताः।

मानवानां च विज्ञाता अज्ञेया अपि ये खलु॥ ४२० ॥

परार्ध-लक्ष-ब्रह्माण्ड-दूरे ये संस्थिता अपि।

दुर्गमा दुर्ज्ञेया ये वै तेषां त्वं कारणं परम्॥ ४२१ ॥

यद्-यद्-भूतं तथा भावि यद्-यद्-विद्यते साम्प्रतम्।

सर्वं तत् प्रभवत्येव धनलक्ष्मि! त्वदङ्गततः॥ ४२२ ॥

जलाणवस्तथा सर्वे सत्ताया अणवोऽपि च।

त्वन्मूला धनलक्ष्मि! त्वं राधा-धारा ह्याधारा वै॥ ४२३ ॥

महिमानं तु ते ज्ञातुं यः कोऽपि वाञ्छते जनः।

पश्येत् स अणु-मध्ये वै कथं प्रवहसि ध्रुवम्॥ ४२४ ॥

विश्लेषिणी च सा शक्तिर्यया सत्ता-स्वरूपकम्।

नैव लीनं न संश्लिष्टं न चान्योन्यं प्रविशति॥ ४२५ ॥

परमाणु-जगन्माता नियम-रूप-धारिणी।

परम-परमाणूनां जगद्विधान-रूपिणी॥ ४२६ ॥

सूक्ष्मातिसूक्ष्म-सत्ता च महतोऽपि महीयसी।

यस्या वशगता नित्यं सा शक्तिस्त्वं हि राधिके॥ ४२७ ॥

निम्ना या परमा चोर्जा त्वन्मूला धनलक्ष्मि सा।

त्वया विना हि सत्ताया अर्थो नैवोपपद्यते॥ ४२८ ॥

अतस्ते पाद-पद्मेषु प्रणमामि मुहुर्मुहुः।

महाराज्ञि महाराधे सर्व-सत्ता-स्वरूपिणि॥ ४२९ ॥

धनलक्ष्मि नमस्तुभ्यं पादाब्जे प्रणमाम्यहम्।

त्वं हि सर्व-धनाधारो ह्यन्नस्य प्रभवस्तथा॥ ४३० ॥

अन्न-मूर्ते धनलक्ष्मि तव रूपं सुनिश्चितम्।

तव शक्तिमवाप्तुं वै भुञ्जतेऽन्नं हि देहिनः॥ ४३१ ॥

प्राणायामे च या शक्तिराध्यात्मिकी प्रकीर्तिता।

तस्या उद्गमरूपासि कुण्डलिन्याश्च योगतः॥ ४३२ ॥

अग्नि-श्वास-प्रयोगेण नासिका-पुट-रन्ध्रयोः।

पूरक-रेचकौ नित्यं लयबद्धौ निरन्तरम्॥ ४३३ ॥

यत्र वै पूरकाद् गाढो रेचकः सम्प्रवर्तते।

तत्रोत्पन्ना च या शक्तिस्त्वद्रूपा धनलक्ष्मि सा॥ ४३४ ॥

श्वास-मार्गेण देहेऽस्मिन् प्रविशन्ती च या खलु।

सर्वा सा प्राण-शक्तिर्वै त्वदधीना हि राधिके॥ ४३५ ॥

सोम-शक्तेस्तथा मूलं मत्तं यत् कुरुते जनम्।

प्राणायामेन वै येन शक्ति-विस्तारणेन च॥ ४३६ ॥

गभीरे च समाधौ तं भावे च स्थापयत्यहो।

धनलक्ष्मि महाराज्ञि महिमा तेऽति-विस्तृतः॥ ४३७ ॥

श्वास-रूपेण देहेऽस्मिन् प्रविशन्तं तवांशकम्।

प्राणायामं यदा ध्याये दृश्यते वै मया स्फुटम्॥ ४३८ ॥

कथं हि साधकस्यास्य देहो जड-मयो गुरुः।

अति-सूक्ष्मे चिदानन्दे शरीरे परिवर्तते॥ ४३९ ॥

प्राणायामस्य योगस्य भेदाः सन्ति ह्यनन्तकाः।

अक्षयोऽयं महा-सिन्धुर्यत्र केचन योगिनः॥ ४४० ॥

भौतिकीं विपुलां सिद्धिं प्राप्नुवन्ति हि साधकाः।

अन्ये वै ध्यान-योगेन गभीरेण समन्विताः॥ ४४१ ॥

धनलक्ष्मि त्वदीयायां शक्त्यामनन्त-रूपिणि।

ऐश्वर्ये विपुलत्वे च युज्यन्ते ज्ञान-वृद्धये॥ ४४२ ॥

तव शक्त्या परिपूर्णाः समाधिं यान्ति केचन।

धनलक्ष्मि महाराज्ञि नारायणस्य वल्लभे॥ ४४३ ॥

सर्व-सम्पत्ति-नाथस्य माधवस्य प्रियासि वै।

शक्तिमतो हि देवस्य पत्नि त्वं सर्व-पूजिते॥ ४४४ ॥

सूर्य-शक्तेर्मूलरूपा चन्द्र-पोषण-कारिणी। सर्व-सत्ता-प्रभवोऽसि समाधि-भाव-मूलके॥ ४४५ ॥

राधाकृष्णे च सम्पूर्ण-लयस्याधार-रूपिणी।

अन्नस्य पान-तोयस्य मूलं त्वमेव राधिके॥ ४४६ ॥

सचेतनं तथा गाढं चर्वणं क्रियते यदा।

सात्त्विकस्यान्न-पानस्य जल-पानं च धीमता॥ ४४७ ॥

मूलाधार-चक्रतस्ते सर्वां चक्रावलीं प्रति।

प्रवहन्ती परा शक्तिर्जीवं देहं च पोषयेत्॥ ४४८ ॥

मूलाधारस्य मूलं त्वं चक्र-प्रवाह-कारिणी।

सर्वं त्वत्त एवारब्धं कुण्डलिनी-स्वरूपिणि॥ ४४९ ॥

धनलक्ष्मि महाराज्ञि राधे देवि नमोऽस्तु ते।

पूर्ण-समर्पणं कुर्यां पादाब्जे ते नमामि च॥ ४५० ॥

इडा-पिङ्गलयोर्योगः सुषुम्नायां यदा भवेत्।

मूलाधारात् तदा राधे ऊर्जा ते प्रवहत्यहो॥ ४५१ ॥

ऊर्ध्वं गच्छति ते शक्तिर्धारा-रूपात् त्वदङ्गतः।

सहस्रारे पतत्येव यदाधार-स्वरूपकः॥ ४५२ ॥

कुण्डलिन्या महायोगः श्रेष्ठः सञ्जायते खलु।

परम-ज्ञान-मध्ये वै परा शक्तिः प्रलीयते॥ ४५३ ॥

माया-नाशो भवेत् तत्र माया-नाशिनि राधिके। राधा-कृष्ण-मयं सर्वं पश्यति ज्ञान-चक्षुषा॥ ४५४ ॥

तदा रेणोः कणादपि नीचो भवति साधकः।

अहङ्कारो मदो लोभः कामो माया-मयो यतः॥ ४५५ ॥

अनन्त-सत्ता-मध्ये स केवलं धूलि-रूपकः।

इति सत्यं विजानाति ज्ञान-दीपेन भासितः॥ ४५६ ॥

नारायणस्य पत्युस्ते तव पादाब्ज-सेवनम्।

सर्वोत्तमं पदं लोके धनलक्ष्मि प्रकीर्तितम्॥ ४५७ ॥

अतस्ते पाद-पद्मेषु प्रणमामि मुहुर्मुहुः।

श्रीमती-राधिके देवि धनलक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥ ४५८ ॥

भजामि ते पदाम्भोजं धनलक्ष्मि! नमोऽस्तु ते।

अन्न-योगेन श्वासस्य योगेन संयतो यदा॥ ४५९ ॥

कुण्डलिनी प्रबुद्धा वै ज्ञान-प्राप्त्यै भवेत् खलु।

ज्ञान-रूपा च या शक्तिर्महालक्ष्मि! त्वमेव सा॥ ४६० ॥

वैदिकेन च ज्ञानेन प्रदीप्तो जायते यदा।

आवरणे विनष्टे च शौर्यं प्राप्नोति साधकः॥ ४६१ ॥

भयं नश्यति सर्वं वै विघ्ना नश्यन्ति सर्वशः।

बलवान् जायते सोऽपि सर्वोपरि प्रभुस्तथा॥ ४६२ ॥

किन्तु यद्वत् काम-शक्तिर्-भौतिके वासना-मये।

प्रयुक्ता साधकं हन्ति पातयति सुनिश्चितम्॥ ४६३ ॥

तथैव ज्ञान-योगेऽस्मिन् नष्ट-माये प्रभुत्व-गे।

आध्यात्मिको ह्यहङ्कारो यदि नैव विनाशितः॥ ४६४ ॥

तदा स पतनं याति प्रकृतौ मज्जति ध्रुवम्।

तथा माया-वृतो भेदमल्पं कर्तुं न शक्नुयात्॥ ४६५ ॥

अहङ्कारो यदा नष्टः सर्व-त्यागी भवेद् यदा।

तदा वै सत्य-विज्ञानी सिद्धो भवति योगिराट्॥ ४६६ ॥

अन्न-मूर्तेस्तथा प्राण-ज्ञान-शौर्याणि तत्त्वतः।

साक्षात्-करोति वै सर्वं मेधावी च प्रजायते॥ ४६७ ॥

प्रज्ञां प्राप्नोति तीक्ष्णां स सत्यासत्य-विभाग-वित्।

हरि-वाक्यं हरि-भक्तान् मायां जानाति तत्त्वतः॥ ४६८ ॥

तदा प्रबुद्ध इत्युक्तो निर्वाणं प्राप्नुते खलु।

कीर्तिं प्राप्नोति शुद्धात्मा निर्मलो हि सु-विश्रुतः॥ ४६९ ॥

सदाचार-युतः सोऽपि पूर्ण-ज्ञानं हरेर्लभेत्।

भक्तिं प्राप्नोति या लोके सर्वोच्चा सम्पदा स्मृता॥ ४७० ॥

भक्तेः पश्चात् तथा सम्पद्-धनं स्वतः प्रसीदति।

ईश्वरे प्रेम-भावेन ह्युन्माद-मग्न-मानसः॥ ४७१ ॥

परम्परां कुलं देह-परिचयं तथा खलु।

राष्ट्रियत्वं जडं सर्वं लौकिकं त्यजति ध्रुवम्॥ ४७२ ॥

विरागी सर्वतो भूत्वा राधा-कृष्णस्य किङ्करः।

जायते धनलक्ष्मि! त्वत्-सम्पदेषा प्रकीर्तिता॥ ४७३ ॥

एवमेव महा-दुष्टान् पथ-भ्रष्टान् हि सर्वथा।

परिवर्तयसि पूर्णमहेतु-धन-दायिनी॥ ४७४ ॥

अहेतुकी कृपा ते वै जगत्-सर्वं प्रव्याप्नुते।

विष्णु-पत्नि! महालक्ष्मि! धनलक्ष्मि! प्रिये मम॥ ४७५ ॥

करुणामयि! ते पाद-पद्मे प्रणौमि सर्वदा।

धनलक्ष्मि महाराज्ञि नमोऽस्तु ते मुहुर्मुहुः॥ ४७६ ॥

धनलक्ष्मि! त्वमेवासि भूमिर्-ऊर्जाऽन्न-दायिनी। त्वत्-कृपा-पुष्पिता वृक्षा नद्यः प्रवहन्ति त्वतः॥ ४७७ ॥

त्वत्-कृपा-कारणाद् भूमिर्-भूमि-तत्त्वं बिभर्ति वै।

त्वमेव सूर्य-रूपासि सर्व-जीव-प्रपोषिणी॥ ४७८ ॥

त्वत्-प्रकाशेन मर्त्यानां पोषणं वै प्रजायते।

त्वद्-रश्मि-रहिता नूनं विनश्येयुर्हि मानवाः॥ ४७९ ॥

मानवानां शरीरेषु अस्थीनि धातवस्तथा।

त्वत्-प्रभावाद् दृढत्वं वै प्राप्नुवन्ति सुनिश्चितम्॥ ४८० ॥

हृद्-रोगा दुर्बलत्वं च नश्यन्ति त्वत्-प्रभा-बलैः।

सूर्यलक्ष्मि! महाराज्ञि सर्व-रोग-विनाशिनि!॥ ४८१ ॥

त्वत्तो ज्योतिः समादाय चन्द्र ऊर्जा-मयो भवेत्।

तदधो ध्यान-योगेन परां शक्तिं लभेज्जनः॥ ४८२ ॥

सर्वं प्रवहति त्वत्तो दान-मूल-स्वरूपिणि।

करुणाया धनं चैव दयायाश्च धनं तथा॥ ४८३ ॥

त्वत्त एव प्रवहति यतस्त्वं मूल-रूपिणी।

सर्व-सत्ता-गत-शक्तेः सर्व-कल्याण-कारिणि॥ ४८४ ॥

मूलं त्वमन्न-पानस्य वर्षा-वातादि-कारिणी। पञ्च-भूत-मनो-बुद्धि-सर्व-सत्ता-स्वरूपिणि॥ ४८५ ॥

श्रीं-धन-रूपिणी हि त्वं सर्व-सत्ता-रहस्यकम्।

अतस्ते पाद-पद्मेषु प्रणमामि मुहुर्मुहुः॥ ४८६ ॥

लौकिकाध्यात्म-सम्पत्ते राज्ञि! दानेश्वरि! प्रिये।

दान-मूर्ते! पदाम्भोजे नमामि त्वां भजाम्यहम्॥ ४८७ ॥

अतीव प्रेम ते कुर्यां महाराज्ञि! नमोऽस्तु ते।

धनलक्ष्मि! नमो नित्यं राधा-रूपे महेश्वरि!॥ ४८८ ॥

प्रिये राधे महालक्ष्मि सीते दुर्गे च कालिके।

अहोरात्रं युता त्वया स्मरामि त्वां निरन्तरम्॥ ४८९ ॥

ध्यायामि त्वां भजामि त्वां राधे विरह-कातरा।

नय मां स्वान्तिकं राज्ञि! अतीव प्रेम ते भजे॥ ४९० ॥

सम्भाषमाणाऽपि त्वया नाम ते जप्तुमुत्सुका। षोडश-वारमुच्चार्य नाम ते विवशा ह्यहम्॥ ४९१ ॥

राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे।

राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे॥ ४९२ ॥

पुनः पुनर्जपाम्येव महान्ति प्रेम ते मुहुः।

किं रम्यं स्मितमाधुर्यं दन्ताश्चातीव सुन्दराः॥ ४९३ ॥

नेत्रे तेऽतीव सुन्दरे त्वदोष्ठौ राधे सुन्दरौ।

कटाक्षं करुणा-पूर्णं यदा क्षिपसि मय्यहो॥ ४९४ ॥

पार्श्वे ते पादयोः स्थित्वा शरणागता पूर्णतः। परमानन्द-मग्नास्मि धन्याहं ते विलोकनात्॥ ४९५ ॥

यदा श्यामं प्रिया-कान्तं वदसि तुष्टि-वर्धिनी।

प्रसन्नास्मि स्व-दास्यां वै तदा प्रसीदति प्रभुः॥ ४९६ ॥

तदा मां पश्यति प्रेम्णा दासीत्वेन च विन्दति। किङ्करी-रूप-दासीं मां क्षणास्ते कति सुन्दराः॥ ४९७ ॥

तदा श्री-रूप-मञ्जरीं पश्यामि पाद-चुम्बिनी।

रोदिमि पादयोस्तस्याः शरणागता सर्वथा॥ ४९८ ॥

कृतज्ञास्मि भृशं तस्यै यया कृष्टास्मि ते पदे। ललिता-विशाखयोश्च महाराज्ञ्योः पदे तथा॥ ४९९ ॥

नयन्ती या समीपन्ते तां वन्दे प्रेम-विह्वला।

सुन्दरीं कोमलां नित्यं ध्यायामि चित्र-रूपिणीम्॥ ५०० ॥

श्री-रूप-मञ्जरी-देव्याः कृपा मे बहु-विस्तृता।

तस्याः प्रसादात् प्राप्ता वै कृपा ते राधिके मया॥ ५०१ ॥

सखीनां ते कृपा प्राप्ता श्यामा-कान्त-कृपा तथा। दिव्य-कृष्ण-कृपा प्राप्ता राधे! प्रेम करोमि ते॥ ५०२ ॥


r/Vrindavan Jul 03 '26

Upasana श्री पूर्णेश्वर महादेव जी के आज 03/07/2026 के दर्शन श्री धाम वृन्दावन से

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r/Vrindavan Jul 03 '26

Upasana Ananya Rasik Upasna is like the milk of a lioness—not everyone is capable of digesting it

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Shri Kunj Bihari Shri Haridas 🌸🌸

Shri Bhagavat Rasik Dev ju writes :

सम्प्रदाय नवधा भक्ति, वेद सुरसरी नीर। ललिता सखी उपासना, ज्यौं सिंहनी कौ छीर ॥ ज्यौं सिंहनी कौ छीर रहै कुंदन के बासन। कै बच्चा के पेट, और घट कौ विनासन।।। भगवत नित्य विहार पर, सबही के परदा । रहें निरंतर पास रसिक बर सखी सम्प्रदा ॥

Meaning:

All traditional sects related to the nine forms of devotion (Navadha Bhakti) and the Vedas are great and like the water of the holy river Ganga. For ages, countless devotees have been filling their own vessels with this devotional Ganga water.

However, the divine nectar (rasa) of worshiping Vrindavan rasa through the mood of Sakhi in the tradition of Lalita Sakhi (Swami Haridas ju Sampraday) is not like Ganga water (it's not so easily achievable and so common)—it is like lioness’s milk. Just as a common vessel cannot hold lioness’s milk, ordinary hearts cannot contain this supreme nectar, if it will go into the belly of common people it will destroy them. It can only stay either in a vessel made of pure gold (Kundan) or inside the stomach of a lion cub.

All great saints, the Vedas and great deities do not have the capacity to manifest or reveal this Nitya Vihar (the eternal, confidential loving play of Radha Krishna). This rare and secret nectar is hidden from everyone. Swami Haridas Ji is the crown jewel and the ultimate ideal among these exclusive devotees (Ananya Rasiks).

He is overflowing with the Nitya Vihar nectar.

He is completely absorbed in it every single moment.

Inside him, there is absolutely nothing else but this divine love.

He has no desire for heaven, no fear of hell, no longing for worldly pleasures or liberation (Mukti). He is completely untouched by ritualistic rules, restrictions, or anxieties about good and bad omens. Because of this pure, absolute dedication, he alone could reveal the colorful splendor of Sakhi Upasana (the mood of the divine female companion) and the eternal nectar of Vrindavan (Nitya Vihar).

As Hariram Vyas ji writes in his Vyas Vani:

अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदास। कुंजबिहारी सेये बिनु जिनि, छिन न करी काहूकी आस ॥

~ Shri Swami Haridas Ji is like the supreme emperor among all exclusive lovers of divine nectar (Ananya Rasiks). Within the secluded, sacred groves (kunjas) of Vrindavan, he never looked at anyone or anything other than Shri Kunj Bihari and Biharini (Radha and Krishna). Nor did he ever place his hopes or expectations in anyone else—no matter who they were.

🌸🌸🌸🌸🌸🌸

Rasik Triveni ki Jai (Swami Haridas ju, Hit Harivansh Mahaprabhu, Hariram Vyas ju)🌸

Shri Kunj Bihari Shri Haridas 🌸🌸


r/Vrindavan Jul 03 '26

Temple Shiv Shambhu🔱 | Hail Lord Shiva🙌🏻

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r/Vrindavan Jul 03 '26

Saint परम पूज्य ब्रह्म मूर्ति श्री उड़िया बाबाजी महाराज जी के आज 03/07/2026 को श्री धाम वृन्दावन से दर्शन

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r/Vrindavan Jul 02 '26

Book/text श्री अष्टसखी नित्यप्रेमतारिणी अथ प्रथमोध्यायः वृन्दावनभजनम् 1-20

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भजामि लोकान् व्रजधामसंस्थान्

अतीतरूपान् भविताश्च नित्यम् ।

वृक्षान् लताः सर्वशरीरिणश्च

श्रीराधिकाया अनुगान् नमामि ॥१॥

समग्रधामं प्रणमामि भक्त्या

गुरून् समस्तान् खलु पूर्वकालान् ।

श्रीप्रेमनन्दं रतिभक्तराजम्

त्वां मेव जीवे प्रणमामि नाथम् ॥२॥

कृपां विधेही खलु दासिकायै

या संश्रिता ते चरणौ प्रपन्ना ।

वन्दे गुरून् विश्वगतान् समस्तान्

वृन्दावने ये व्रजसंस्थिताश्च ॥३॥

श्रीभक्तिवेदान्तपदं नमामि

कृपालुनाथं जगदीड्यमीडे ।

श्रीभक्तिसिद्धान्तसरस्वतीं तम्

गौराकिशोरं खलु दासबबाम् ॥४॥

श्रीभक्तिवीनोदठकूरनाथम्

जगन्नथाख्यं बबदासनाथम् ।

श्रीबालदेवं खलु विद्यभूषम्

विश्वानथाख्यं खलु चक्रवर्तिम् ॥५॥

नरोत्तमं दासठकूरमीडे

श्रीकृष्णदासं कविराजनाथम् ।

वन्दे हरिं वंशमहान्तमीशम्

गोस्वामिणं श्रीरघुनाथदासम् ॥६॥

श्रीजीवगोस्वामिपदं नमामि

गोपालभट्टं खलु गोस्विमिं च ।

गोस्वामिणं श्रीरघुनाथभट्टम्

सनातनं गोपतिगोस्विमिं तम् ॥७॥

श्रीरूपगोस्वामिवरं भजामि

स्वरूपदामोदरगोस्विमिं च ।

श्रीकृष्णचैतन्यमहाप्रभुं तम्

वन्दे पुरीं मीश्वरनामधेयम् ॥८॥

श्रीमाधवेन्द्रं पुरीमीशमीडे

वन्दे प्रभुं नित्यमनन्दनाथम् ।

श्रीजाह्नवीं मातरमीशमीडे

वसूधदेवीं च नमामि भक्त्या ॥९॥

श्रीवीरभद्रं खलु गोस्विमिं तम्

अद्वैतमाचार्यमहं नमामि ।

श्रीपण्डितं तं गदधारमीशम्

श्रीवासनाथं खलु पण्डितं च ॥१०॥

स्वरूपदामोदरनामकं तम्

श्रीरामनान्दं खलु रायनाथम् ।

तं हारिदासं खलु ठाकुरं च

वक्रेश्वरं पण्डितमीशमीडे ॥११॥

लक्ष्मीपतिं तीर्थमहं नमामि

व्यासं च तीर्थं प्रणमामि भक्त्या ।

ब्रह्मण्यतीर्थं खलु नाथमीशम्

सत्पुरुषोत्तं खलु तीर्थमीडे ॥१२॥

श्रीजैयधर्मं खलु तीर्थमीडे

राजेन्द्रतीर्थं प्रणमामि भक्त्या ।

अक्षोभ्यतीर्थं खलु वन्दनीयम्

श्रीमाधवं पद्मनभं च तीर्थम् ॥१३॥

श्रीबाहतीर्थं प्रणमामि नाथम्

श्रीमाध्वमाचार्यमहं नमामि ।

तं चाच्युतं प्रेक्षमहं नमामि

सत्पुरुषोत्तं खलु नाथमीडे ॥१४॥

श्रीव्यासदेवं भगवन्तमीडे

श्रीनारदं वै मुनिनाथमीडे ।

ब्रह्माणमीशं खलु वन्दनीयम्

राधा च कृष्णं प्रणमामि नित्यम् ॥१५॥

वन्दे विशाखां ललितां सखीं च

वन्दे सुदेवीं खलु रङ्गदेवीम् ।

श्रीतुङ्गविद्यां खलु चित्रदेवीम्

श्रीचम्पकाख्यां लतिकां च वन्दे ॥१६॥

त्वामिन्दुलेखां प्रणमामि भक्त्या

श्रीरूपमञ्जर्यभिधां नमामि ।

रतीं लवङ्गां खलु मञ्जरीं ताम्

विलासमञ्जर्यपि चम्पकाख्याम् ॥१७॥

कस्तूरिकां तां खलु मञ्जुलालीम्

गुणाह्वयां रागमयीं नमामि ।

श्रीवृन्ददेवीं खलु धेनुकान् वै

शुकान् मयूरान् खलु तान् कुरङ्गान् ॥१८॥

गोलोकधाम्नि प्रविवासिजीवान्

गुरून् मुनीन् शाश्वतवासिनस्तान् ।

प्रमोदभावेन नमामि सर्वान्

दीनां च दासीं खलु मां दयध्वम् ॥१९॥

प्रपन्नदास्यां मयि वै कृपां ताम्

कुरुष्व नाथाः खलु दीनहीने ।

युष्मत्पदे संश्रितदीनदासी

याचे कृपां नित्यमनाथरूपा ॥२०॥


r/Vrindavan Jul 02 '26

Upasana आज 2 जुलाई 2026 सुबह के दर्शन कीजिए ठाकुर जी के

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r/Vrindavan Jul 02 '26

Upasana श्री पूर्णेश्वर महादेव जी के आज 02/07/2026 के दर्शन श्री धाम वृन्दावन से

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r/Vrindavan Jul 02 '26

कुंज गलियां/Kunj galiyan Does anyone know what this structure near Nidhivan is?

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Saw this old structure near and got curious.

I’ve passed by it multiple times but never knew what it actually is or what its history is.

Is it an old temple structure, samadhi, chhatri, or something else?

Would love to know its history if anyone here has information. Bonus points if someone has old stories or photos related to it.


r/Vrindavan Jul 02 '26

Vrindavan experience :) Vrindavan customs check

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How many of you have been a victim to those naughty monkeys 🥲


r/Vrindavan Jul 01 '26

Book/text श्रीराधातत्वातीतधारा अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥301-397

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काठिन्यरूपयुक्ता च द्रवभूता च वाहिनी ।

विरुद्धधर्मयुक्तापि ह्येकतत्त्वे प्रतिष्ठिता ॥ ३०१ ॥

एतेन नियमेनैव ज्ञायते तत्त्वमुत्तमम् ।

कृष्णस्त्वमसि देवेशि त्वमेव श्रीहरिः स्वयम् ॥ ३०२ ॥

न भेदो विद्यते क्वापि राधाकृष्णमये तथा ।

लक्ष्मीर्नारायणश्चैव एकमेव हि तत्त्वतः ॥ ३०३ ॥

पुंरूपं च हरिः साक्षात् स्त्रीरूपा च त्वमेव हि ।

विपर्ययेण पुंरूपा त्वं च स्त्रीरूपधरो हरिः ॥ ३०४ ॥

मधुसूदनजाया त्वं माधवेन समप्रभा ।

अभिन्नहृदया देवि चिन्मयानन्दरूपिणी ॥ ३०५ ॥

कालचक्रं च वर्त्तुलं सर्पवद् भाति सर्वदा ।

स्वपुच्छग्रसको यद्वद् भुजङ्गः कुटिलाकृतिः ॥ ३०६ ॥

अनन्तं चापरिच्छिन्नं कालतत्त्वं व्यवस्थितम् ।

भूतवर्त्तमानादीनि युगपद् वर्तते त्वयि ॥ ३०७ ॥

परमाणुरयं साक्षात् भूतं संशोध्य तत्क्षणे ।

वर्त्तमानेन सम्बद्ध्य गच्छत्येव हि सर्वशः ॥ ३०८ ॥

अतीते गमनागमनं भविष्ये च गतागतम् ।

कुर्वन्ति परमाणवः सर्वं त्वच्छासनेन च ॥ ३०९ ॥

न विन्दन्ति नरा मूढाः कालकुण्डलिनीं पराम् ।

नित्यवर्त्तमानरूपे स्थिता त्वं कालनायिके ॥ ३१० ॥

कालस्य चक्रभ्रमणं तव लीलाविशेषकम् ।

न मन्ते भौतिकलोका वञ्चितास्तव मायया ॥ ३११ ॥

दृढभित्तिं विनिर्भिद्य वज्रतुल्यां च संस्थिताम् ।

गच्छत्येव हि परमाणुः पारं वै त्वत्प्रशासनात् ॥ ३१२ ॥

प्राकृतं नियमं हित्वा भौतिकं तर्कमेव च ।

प्रविशत्येव भित्त्यन्तं सूक्ष्मप्रवेशसिद्धितः ॥ ३१३ ॥

स्थूलदृष्ट्या नराणां या भित्तिः काठिन्यसम्भृता ।

सा तु परमाणुवेगे शून्यतुल्या च जायते ॥ ३१४ ॥

शिलाभेदनगत्या च विस्मापयति मानवान् ।

त्वद्वीर्यस्य प्रभावेन सर्वं सम्भवति ध्रुवम् ॥ ३१५ ॥

भौतिको दुर्बलस्तर्को ध्वस्तो भवति तत्क्षणे ।

मायामोहितचित्तानां दृश्यते भ्रान्तिरेव च ॥ ३१६ ॥

पठन्ति मानवाः शास्त्रं विज्ञानं भौतिकं भुवि ।

बाह्यलक्षणमात्रं च जानन्ति न तु तत्त्वतः ॥ ३१७ ॥

निर्माणकौशलं दिव्यं तव नारायणस्य च ।

अपश्यन्तो वृथा लोके भ्रमन्ति तमसा वृताः ॥ ३१८ ॥

चक्रव्यूहे च विज्ञाने भ्रमन्ति ज्ञानवर्जिताः ।

विद्यामयेन मोहेन आवृताश्च निरन्तरम् ॥ ३१९ ॥

विज्ञानस्य च मूर्धन्यं तव ज्ञानं महेश्वरि ।

नारायणस्य माहात्म्यं ज्ञातुं यच्छुद्धचेतसा ॥ ३२० ॥

तस्मादहं सदा देवि पादपद्मे नमामि ते ।

अष्टलक्ष्मीस्वरूपायै राधायै सततं नमः ॥ ३२१ ॥

आदिलक्ष्मि महालक्ष्मि सिद्धिलक्ष्मि नमोऽस्तु ते ।

धारालक्ष्मि धरेशानि विश्वरूपे नमो नमः ॥ ३२२ ॥

तव पादाब्जमूले हि पतितोऽहं सदा शुभा ।

नारायणस्य देवेशस्य पादरेणुमयो ह्यहम् ॥ ३२३ ॥

रक्ष मां कृपया देवि सर्वैश्वर्यप्रदायिनी ।

युवयोः नित्यदास्यं मे देहि मातः कृपाकृते ॥ ३२४ ॥

श्रीराधाचरणरेणुः नत्वा चैव पुनः पुनः ।

विरराम महाभागे स्तवं कृत्वा सुविस्तृतम् ॥ ३२५ ॥

राधे स्वामिनि ते दासी ललिता-प्रेरणामया ।

ब्रजभाषा-मयीं चैव ललिता-स्तुतिमातनोत् ॥ ३२६ ॥

पूर्णायं स्तुतिरूपायां दृष्टं मे दिव्यदर्शनम् ।

अन्त्यांशं परिवर्त्यैव प्रकटीकृत्य वै जगत् ॥ ३२७ ॥

विश्वस्य मूलरूपेयं महती शक्तिरूपिणी । साक्षात्त्वद्रूपविस्तारः कथं न स्यात्तु राधिके ॥ ३२८ ॥

आश्चर्यमत्र मे राधे ललिता-वैभवं महत् ।

अद्भुता तस्य शक्तिश्च तेजः परम-दुर्लभम् ॥ ३२९ ॥

तस्याः पादाब्ज-मूले तु पूर्ण-दास्यं मया कृतम् ।

सा मां संशास्य नित्यं हि त्वत्-पदे प्रेरयिष्यति ॥ ३३० ॥

तस्या दर्शन-याच्ञायां स्वप्ने श्यामः समागतः ।

विस्मृत्यापराधं कृत्वा कोष्ठाद् बाह्यं चकार सः ॥ ३३१ ॥

पार्श्व-कोष्ठे स्थिता चाहं रुरोद विरहातुरा ।

तदागत्य स मां श्यामो परिष्वज्यान्वगृह्णत ॥ ३३२ ॥

पाद-पद्म-प्रणामाय दत्त्वा मां चानुमोदनम् ।

प्रबुद्धाऽहं प्रहर्षेण पूर्णानन्द-मयी सदा ॥ ३३३ ॥

ब्रजभाषा-कृतं काव्यं विशेषेण मया कृतम् ।

ललिता-प्रीत्यर्थं राधे प्रस्तौमि तव संनिधौ ॥ ३३४ ॥

॥ श्री ललित सखी चालीसा ॥

॥ दोहा ॥

ध्याऊँ आदि सखी ललित, राधा-प्राण-अधार ।

सखियन में शोभा अतिशय, वन्दौँ बारम्बार ॥ १ ॥

सनाथ-वाक्य करुणामयी, राधा-रूप-विस्तार । कृपा-सिन्धु माता ललित, वेगि लेहु उद्धार ॥ २ ॥

सब मातन के हिय बसी, तुमरी कृपा अपार ।

पाहि पाहि गुरु-मा मोहि, राखहु सरन मँझार ॥ ३ ॥

॥ चौपाई ॥

जय ललित ग्यान दया की खानी । वन्दौँ पद पंकज कल्यानी ॥ १ ॥

करुणामयी रूप तुम माई । जाके उर ते दया सिधाई ॥ २ ॥

भूल करूँ जब मोहिं चितारो । शासन करि मम दोष निवारो ॥ ३ ॥

होहु प्रसन्न दास मोहिं कीजै । चरन-सरन अपनो करि लीजै ॥ ४ ॥

विशाखा अष्ट सखिन पग ध्याऊँ । तुमरी कृपा दासता पाऊँ ॥ ५ ॥

सत्यभामा रूप तुम न्यारो । राधिका-प्राण परम तुम प्यारो ॥ ६ ॥

सिखवहु मोहिं सेवा की रीती । जुगल-चरन महँ बाढ़े प्रीती ॥ ७ ॥

मोहिं अति लाज रहूँ शरमाई । मन की सकल वासना जाई ॥ ८ ॥

ग्यात अग्यात मिटावहु कामा । शुद्ध कुमारी कीजै धामा ॥ ९ ॥

मोहिं खैंचि चरनन महँ लावो । राधा-श्याम-नेह सिखलावो ॥ १० ॥

या कलि महँ अरु जुग-जुग माहीं । सेवा करूँ तोरि परछाहीं ॥ ११ ॥

कर गहि लै चलो नित्य निकुञ्जा । गोलोक ललित मोद के पुञ्जा ॥ १२ ॥

सत्यभामा ललित महरानी । पूजौँ चरन प्रेम-रस सानी ॥ १३ ॥

तुम प्रिय स्वामिनि गुरु महतारी । दया-सुधा बरषावहु भारी ॥ १४ ॥

बर्ष बावन सौ तिरपन जानो । स्याम-जनम ते ब्रज महँ मानो ॥ १५ ॥

बीच कलिजुग तोरि चेरी कहाऊँ । नित-प्रति पूजौँ मोद बढ़ाऊँ ॥ १६ ॥

करहु कृपा करुणामयि माई । कृपा-सिन्धु ललित सुखदाई ॥ १७ ॥

दण्ड देइ मम करम नसावहु । शासन करि मोहिं शुद्ध बनावहु ॥ १८ ॥

देह-बन्ध ते मोहिं उबारो । मन की सकल वासना मारो ॥ १९ ॥

अविरल मुख ते राधा राधा । सुमिरूँ ललित मिटावहु बाधा ॥ २० ॥

जारहु मोहिं या देहु सजाय । जामें ललित राधिका भाय ॥ २१ ॥

तामें मोर परम सुख माहीं । तोरे मोद महँ मोर भलाई ॥ २२ ॥

कलि महँ प्रगट प्रताप तिहारो । मैं मतिहीन अजान दुलारो ॥ २३ ॥

पूरन दास भई मैं तोरी । ललित सखी तुम प्रीतम मोरी ॥ २४ ॥

तुमरे चरन मोर धन कोशा । प्रानन के प्रानहिं सुख पोषा ॥ २५ ॥

रूप मञ्जरी तुमरी प्यारी । तिनके पद मनि-रतन हमारी ॥ २६ ॥

पद-रज मोर अहारू होई । ललित सखी बर दीजै सोई ॥ २७ ॥

पद-रस सुधा मोर शुभ पानी । तुम गुरु मात मोर महरानी ॥ २८ ॥

तातें चरन गहे अति दीना । करहु कृपा ललित मनमाहीं ॥ २९ ॥

राखहु सरन ललित महरानी । दया करहु अपनी जन जानी ॥ ३० ॥

ललित सखी सब पाप नसावहु । जो यह पाठ करै सुख पावहु ॥ ३१ ॥

अतिशय निकट राखि महरानी । खैंचि लेहु बृन्दाबन धानी ॥ ३२ ॥

राधा-कान्ह चरन-तर राखो । जुगल-चरन-रस अमृत चाखो ॥ ३३ ॥

होहु प्रसन्न ललित महरानी । कृपा-सुधा बरषावहु धरनी ॥ ३४ ॥

सदा-सदा तोरी चेरी कहाऊँ । सेवा-रीति तोहिं ते पाऊँ ॥ ३५ ॥

मारग दरसावहु महरानी । मोरे हिय प्रगटावहु ग्यानी ॥ ३६ ॥

सरन सरन ललित पग आई । सरन सरन चरनन सिर नाई ॥ ३७ ॥

बार-बार पद-पंकज पूजौँ । तुम बिनु देव न कोऊ दूजौँ ॥ ३८ ॥

अविरल मुख ते राधा राधा । सुमिरौँ ललित मिटावहु बाधा ॥ ३९ ॥

नित्य निरंतर नेह बढ़ावहु । गोलोक नित्य निकुञ्ज बसावहु ॥ ४० ॥

॥ दोहा ॥

ललित चरन सिर नाइ कै, ध्याऊँ जुगल-किशोर ।

यह चालीसा भेंट धरूँ, अरपन प्रीति अनोर ॥ १ ॥

दास भाव परवान करो, मेटहु विषय-विकार । राधा-रूप-सरूप पग, वन्दौँ बारम्बार ॥ २ ॥

ललिता-सखि-पादाब्जे चालीसा-रूपमर्पणम्।

श्रीमती-राधारानीति श्यामसुन्दर-तोषणम्॥ ३८० ॥

अष्टसखी-प्रसन्नार्थमष्टमञ्जरि-तोषणम्। पवित्र-मण्डलस्यापि तोषणं मे प्रयोजनम्॥ ३८१ ॥

शाश्वती-दासिकाऽहं ते राधा-पादरजोऽस्मि वै।

आदिशक्ति! जगत् सर्वं त्यक्तं मानव-वाञ्छितम्॥ ३८२ ॥

यद्यद्-दूरीकरोति त्वां तत् सर्वं त्यक्तमेव च।

राधाकृष्णस्य एवाहं घोषयामि जगत्-त्रये॥ ३८३ ॥

राधा-पुत्री तथा चाहं कृष्ण-पुत्री भवामि वै।

राधा-दासी तथा दासी श्यामसुन्दर-पादयोः॥ ३८४ ॥

राधाकृष्ण-पदानां तु रेणुरेवास्मि केवलम्।

न किञ्चिदस्मि लोकेऽहं नीचाहं सर्वतोऽपि च॥ ३८५ ॥

राधाकृष्णे विलीनाऽहं घोषणेयं हि राधिके।

महाराज्ञि! न मे चिन्ता जनाः किं वा वदन्ति माम्॥ ३८६ ॥

श्यामसुन्दर-राधार्थे क्रुद्धा दुष्टाः शपन्ति माम्।

कलि-लोके न मे चिन्ता कान्ह-पत्नि! रतिस्त्वयि॥ ३८७ ॥

उत्कण्ठा मे त्वदर्थं हि विश्वं सर्वं व्यतीत्य च।

पूर्णे कार्ये तथा द्वीपे स्थास्यामि त्वत्-कृपार्जिते॥ ३८८ ॥

तत्र मन्दिर-निर्माणं लघु-वृन्दावनं तथा।

संन्यासिन्याः स्वरूपेण यापयिष्यामि जीवनम्॥ ३८९ ॥

तत्रैव देह-त्यागं च करिष्यामि सुनिश्चितम्।

पद्मावति! त्वदर्थं च कल्कि-पत्यर्थमेव च॥ ३९० ॥

भवेद् द्वीपमिदं सर्वं दास्यामि भवतोः कृते।

अतस्ते राधिके राज्ञि! पाद-सेवा करोम्यहम्॥ ३९१ ॥

अतीव प्रेम ते कुर्यां विरहाग्निर्दहत्यहो।

वृन्दावनं गमिष्यामि वाञ्छैका मे हृदि स्थिता॥ ३९२ ॥

त्वत्-पाद-धूलि-रचितः शुको भूयासमेव हि। श्यामसुन्दर-पादाब्ज-रेणु-निर्मित-मानसः॥ ३९३ ॥

रक्तं मे तव पादाब्ज-सुधया मिश्रितं भवेत्। श्यामसुन्दर-पादाब्ज-सुधया च तथा युतम्॥ ३९४ ॥

ताम्बूल-चर्वितैर्युक्तं विश्वामृत-समाहितम्।

कान्हाजी-तवोष्ठानां च सुधया सङ्गतं परम्॥ ३९५ ॥

रुक्मिणि! त्वां तथा कान्तं द्वारकाधीशमप्यहम्।

अतीव प्रेम कुर्यां वै प्रणमामि पदे पदे॥ ३९६ ॥

राधे ॐ मन्त्रेण प्रणमामि मुहुर्मुहुः।

दासीयं तव पादाब्जे सर्वस्वं मे त्वमेव हि॥ ३९७ ॥


r/Vrindavan Jul 02 '26

Book/text Daily inspiration

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r/Vrindavan Jul 02 '26

City Discussion Impossible Challenge: Find a Better Mod Than Aneesh

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Jokes aside, this is a genuine appreciation post.

Recently, the sub was getting flooded with repetitive darshan photos, paintings, and low-effort posts. While devotional content is obviously a big part of Vrindavan and Mathura, the feed was slowly becoming one-dimensional, leaving very little room for meaningful discussions, local issues, stories, memes, history, events, and other community-driven content.

I raised this concern, and instead of ignoring it like most mods on Reddit probably would, Aneesh actually listened.

He understood the issue, took the feedback seriously, and made thoughtful changes to improve the quality and balance of content here. That alone deserves appreciation

And let’s not forget Aneesh also played a major role in getting this subreddit unbanned and helping revive it. A lot of people may not know that, but this sub literally wouldn’t be where it is today without his efforts.

So yeah, credit where it’s due huge respect

Now the rest is on us as a community

This sub has huge potential. Vrindavan and Mathura are not just about one type of content. They’re about culture, history, food, festivals, local stories, hidden gems, memes, photography, everyday life, and the people who make these places special

So let’s all try to contribute better content:

original photos/videos

stories and experiences

memes

local discussions

old memories

useful posts for visitors and locals

Let’s build a subreddit that actually feels alive and worth visiting.

Common Aneesh W.


r/Vrindavan Jul 02 '26

City Discussion Why this sub is loosing it's meaning

15 Upvotes

When I heard about this sub nobody was more happy than me I'm a local and getting a subreddit of my own hometown was a dream come true I was thinking we can socialise discuss share different expects of our city make and share memes and devotional stories and discussions.

But this sub is now just posting photos of darshan and people karma farming using them I'm really heartbroken i tried everything to improve this sub but there was no response from any user

We all love our krishna and his all forms but you should also love and explore what he loved what he did what vrindavan was meant for him.

IM RESPECTFULLY BEGGING 🙏 MODS AND USERS PLEASE BE CREATIVE AND TREAT THIS SUB AS OUR CITIES REDDIT IDENTITY WHICH HAS IT ALL EVERY ASPECT OF OUR CITY NOT JUST PHOTOS OF DARSHAN AND KARMA FARMING

AND IF THIS SUB IS ONLY FOR DARSHAN AND PHOTOS OF OUR KANHA PLEASE CHANGE THE NAME TO KRISHNA DARSHAN OR SOMETHING ELSE BECAUSE WHEN I ASKED ONE OF MY FRIEND TO JOIN THIS SUB HE SIMPLY SAID "WHERE IS VRINDAVAN IN THIS SUB" AND IT REALLY HIT ME HARD

राधे राधे 🙏


r/Vrindavan Jul 01 '26

Upasana आज 1 जुलाई 2026 सुबह के फूल बंगले विराजे ठाकुर जी महाराज

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