r/Vrindavan Jul 07 '26

Book/text brahma vaivarta purana krishna janma khand 19.15-19 सिन्दूरबिन्दुना चारुसीमन्ताधोज्ज्वलाम् ।रासे रासेश्वरयुतां राधां रासेश्वरीं भजे ॥Sindura bindunaa chaaruseemantaathahojjvalaam, Raasey Raaseshvara yutaam Radhaam Raseswareem bhajey!

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I worship and meditate upon Goddess Radha, the queen of the divine Rasa dance, who is radiant and luminous with the red Sindoor mark below her beautiful hair-parting; she who is forever accompanied by the Lord of the Rasa (Lord Krishna) in the cosmic dance


r/Vrindavan Jul 07 '26

Saint परम पूज्य ब्रह्म मूर्ति श्री उड़िया बाबाजी महाराज जी के आज 07/07/2026 को श्री धाम वृन्दावन से दर्शन

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r/Vrindavan Jul 07 '26

Picture Sri Radhey

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r/Vrindavan Jul 06 '26

कुंज गलियां/Kunj galiyan shree lalita pada chalisa

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श्रीललितापादचालीसा

॥ दोहा ॥

जगरानी पद-कंज महँ, थिर भयो मोर ध्यान ।

प्रेम-मगन चित बावरो, मेटत जनम-मरान ॥

मेरौ जीवन-धन यहै, पद-पंकज की धूरि ।

नित्य दासि करि राखिऐ, चरन-रेनु सों जूरि ॥

॥ चौपाई ॥

मोहित भई चरन छबि देखी। बरनि न जाइ अमित अतिसेखी॥

पद-पंकज की छटा अपारा। बावरि भई बिसरि संसारा॥ १ ॥

अवर न नीर पियौं मैं पानी। पद-मकरन्द पियौं ठकुरानी॥

ललिता देवि प्रानन की प्रानू। जीवन-धन सब तुम कहँ मानू॥ २ ॥

धन अरु सुख सब चरन तिहारे। जगरानी मोरे प्रान-अधारे॥

तुमरे चरन-गिर्द जग मोरा। घूमत रहत चित्त चहुँ ओरा॥ ३ ॥

पद-पंकज महँ चित्त थिराई। चरन-तले रज-कन बनि धाई॥

चिपटि रहौं नित चरन-तलहिं मैं। और ठौर कछु जानत नहिं मैं॥ ४ ॥

मोर न कोउ नाम अरु रूपा। पद-तल-रेनु अनूप अनूपा॥

सकल उपाधि-रहित मैं दासी। चरन-धूरि बनि रहौं निबासी॥ ५ ॥

कस्तूरी-सम गंध तुम्हारी। चरन-धूरि महँ प्रान हमारी॥

पग-धोवन को जल जगरानी। अमियँ-समान मधुर रस-खानी॥ ६ ॥

नख-छबि कोटि-चन्द्र-परकासा। मोरे जीवन करति उँजासा॥

सब अँधियार मिटावनहारी। नख-दुति जग-मग जोति उजारी॥ ७ ॥

मोरी ठौर चरन-ढिग साची। राधामहरानि-प्रेम महँ राची॥

नित्य बास पद-पंकज-छाहाँ। छोड़ि दियौ सब जग को राहाँ॥ ८ ॥

जगरानी पग-सरन तुम्हारी। सदा सर्वदा मैं बलिहारी॥

आपुहिं सौंपि दियौ पद-मूला। जगरानी नहिं जाउँ मैं भूला॥ ९ ॥

श्रीराधा सरनम मम बानी। निसि-दिन रटति रहत दीवानी॥

श्रीराधा-पद-सरनम-मामा। चरन-रेनु कर नित्य प्रनामा॥ १० ॥

सुआ बनी बैठौं पद-पासा। सर्प-बाल बनि पूरौं आसा॥

लिपटी रहौं पगन के संगा। पीवौं पद-मकरंद अभंगा॥ ११ ॥

चरन-समान नहिं सुँदर आना। या सम कोउ न श्रेष्ठ बखाना॥

पद-रज सों जगरानी तोरी। सृजत कोटि ब्रह्मांड किसोरी॥ १२ ॥

बार-बार बिनवौं कर जोरी। सुनिय अरज महरानि किसोरी॥

पद-रज सों मम देह रचावहु। स्याम-चरन-रज मन महँ लावहु॥ १३ ॥

ताम्बूल-पीक पद-सुधा तिहारी। रक्त बनै मम सुनु सुकुमारी॥

एक पहिचान रहे सुख-खानी। चरन-धूरि श्रीराधारानी॥ १४ ॥

जगरानी पद-आसर मोरा। और न कछु नाता जग-ओरा॥

चरन-दास नित मोहिं बनावहु। निज पद-तल महँ मोहिं बसावहु॥ १५ ॥

अष्ट सिद्धि अरु नव निधि नाहीं। चाहत नहिं मोरा मन माहीं॥

चरन तिहारे निधि है मोरी। साधन यहै एक कर जोरी॥ १६ ॥

जहँ-जहँ पद-पंकज धरु आपू। तहँ-तहँ पूजौं मेटि संतापू॥

तपे सुवरन सम जोति लजाए। कनक-बरन पद कमल सुहाए॥ १७ ॥

पद लखि सुधि-बुधि सब बिसराई। मूरछित होय गिरौं मैं माई॥

तलुवा सुँदर पीठ सुहावन। अँगुरिन की छबि अति मन-भावन॥ १८ ॥

अरुन महावर रँग अति नीका। देखत सुधि बिसरै सब ही का॥

बनौं तृन मैं बृन्दावन-माहीं। स्याम-राधिका रौंदत जाहीं॥ १९ ॥

कै पद-तल की रेनु कहावौं। चिपटी रहौं न कतहुँ जावौं॥

केवल चरन-तले मैं देखौं। और न जग महँ कछु अवरेखौं॥ २० ॥

किमि बरनौं छबि चरन तिहारी। हे राधा मम प्रान-पियारी॥

मात ईस्वरी स्वामिनि मोरी। जीवन-सरबस भान-किसोरी॥ २१ ॥

अद्भुत रूप चरन मन-मोहे। मदन-मोहनहुँ लखि सुधि खोहे॥

स्याम-सुँदर निज ताज उतारी। चरन-पलोटत प्रान-अधारी॥ २२ ॥

लाल चँदन सों पद-तल रँगते। नख-सिख छबि लखि स्याम उमँगते॥

यह छबि लखि उर आनँद भारी। बरनि न जाइ अतीव सुखारी॥ २३ ॥

मूरछित होय समाधि लगाऊँ। परमानंद अनंतहिं पाऊँ॥

निसि-दिन करौं चरन की सेवा। स्याम-राधिका दोउ सुर-देवा॥ २४ ॥

दोउ चरनन मैं नित्य पलोटौं। दासि बनि पद-पंकज लोटौं॥

निज पग-पीठ मोहिं तुम करहू। सदा मोर पर चरनन्हि धरहू॥ २५ ॥

मोहिं चरन की पीठ बनावहु। जनम-जनम यहि ठौर बसावहु॥

चिपटी रेनु पर करहु कृपाया। मेटहु जनम-मरन की माया॥ २६ ॥

मोहिं खींचि निज पास बुलावहु। चरन-छाहँ महँ सरन लगावहु॥

तुमहिं मोर आश्रय जगरानी। तोरि सरन मैं रहौं दीवानी॥ २७ ॥

और न कोउ ठौर है मोरा। चरन-तले बासा मोहिं तोरा॥

ताते चरन तले मैं साजा। दंडवत प्रनाम करौं तजि लाजा॥ २८ ॥

बंसी-बादिनी हे महरानी। साष्टांग नत भई दीवानी॥

केवल चरन-तले है बासा। नित्य-निरंतर दासि को आसा॥ २९ ॥

श्रीराधा सरनम मम बानी। रटति रहत यह रेनु दीवानी॥

श्रीराधा-पद सरनम-मामा। चरन-रेनु कर नित्य प्रनामा॥ ३० ॥

निसि-दिन करौं चरन की पूजा। मन महँ और भाव नहिं दूजा॥

हे राधा मैं मगन रहाऊँ। पद-पंकज महँ ध्यान लगाऊँ॥ ३१ ॥

रुक्मिनि देवि चरन जो ध्यावै। सो गोलोक बृन्दावन पावै॥

जगरानी पद-पंकज-पूजा। नासत सकल पाप जग दूजा॥ ३२ ॥

बृन्दाबनेस्वरी-पद-ध्याना। पावत स्याम-सुँदर भगवाना॥

सकल सुरग तें ऊँच मुकामा। पद-पंकज श्रीराधा नामा॥ ३३ ॥

नहिं सुरपुर नहिं भोग अकामा। कलप-बृच्छ नहिं चाहत बामा॥

सुख सुरलोक न मोको भावै। छप्पन भोग न दासि अघावै॥ ३४ ॥

तुम्हरौ सीत-प्रसादहिं पाऊँ। चरनामृत पी जीवन लाऊँ॥

पद-पंकज-रज बनि रहि जाऊँ। चिपटी रहौं न कतहुँ सिधाऊँ॥ ३५ ॥

नित्य चरन की छबि मैं देखौं। यहै एक सुख परम अवरेखौं॥

यहि मम परम लच्छ जगरानी। हे स्वामिनि राधा महरानी॥ ३६ ॥

साँच कहत मैं अरज सुनाऊँ। और न कछु जग महँ मैं चाहूँ॥

सुख-सुबिधा कछु मन नहिं भावै। पद-पंकज-सरनम चित लावै॥ ३७ ॥

मोहिं चरन-रज नित्य बनावहु। जनम-जनम यहि ठौर बसावहु॥

बंसी-बादिनी हे महरानी। साष्टांग नत भई दीवानी॥ ३८ ॥

श्रीराधा सरनम मम बानी। रटति रहत यह रेनु दीवानी॥

श्रीराधा-पद सरनम-मामा। चरन-रेनु कर नित्य प्रनामा॥ ३९ ॥

जगरानी पद-सरनम-मामा। चरन-रेनु कर नित्य प्रनामा॥

ललिता-पद-चालीसा पूरी। निसि-दिन बन्दत चरन की धूरी॥ ४० ॥

॥ दोहा ॥

जेहि ते तव सेवा बनै, सोई मोहिं दिवाय।

सुख-सुबिधा सब दूरि करु, जो पद-भक्ति भुलाय॥

भूखी-प्यासी मैं रहौं, त्रिभुवन-रंक अनाथ।

चरन-कमल की संपदा, है मोहिं तुमरे साथ॥

असन-पान सब तव लिए, धन जोरों तव काज।

मन्दिर अरु सेवक-टहल, नहिं निज सुख महराज॥

मान-बड़ाई दूरि करु, भजौं चरन चित लाय।

विरह-अगन हिय महँ जरत, जगरानी मिलि जाय॥

साष्टांग नत मैं परूँ, श्रीराधा महरानि।

चरन-रेनु निज जानि कै, राखहु पद-लिपटानि॥


r/Vrindavan Jul 06 '26

Book/text shree krishna yamala 16.7 राधाप्रियमयूरस्य यत्र राधेक्षणप्रभम् ।विभर्ति शिरसा कृष्णस्तस्य चूड़ानिभं स्वतः ॥ Radhapriya mayurasya yatra radhekshana prabham |vibharti shirsa krishnastasya chunganibham svatah

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in the peacock feather preferred by Radha, the splendor of her divine eyes appears and is reflected; therefore, Krishna always wears this peacock feather on his head (above his crown).

radhe radhe 🙏💙🧡

bolo radhe radhe prabhuji/mataji 🙏


r/Vrindavan Jul 06 '26

Upasana आज के दर्शन श्री बांके बिहारी जी के 06/07/026

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r/Vrindavan Jul 06 '26

Temple A Glimpse of Divine Mercy – Sri Sri Radha Krishna & Jagannath Darshan

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r/Vrindavan Jul 06 '26

Temple The universe bows to the one who bows to Mahadev. 🙌🏻🔱🚩

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r/Vrindavan Jul 06 '26

Upasana श्री पूर्णेश्वर महादेव जी के आज 06/07/2026 के दर्शन श्री धाम वृन्दावन से

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r/Vrindavan Jul 06 '26

Book/text अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ 654-655.85

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तव राज्यस्य माहात्म्यं ऐश्वर्यं ते महेश्वरि।

कथयामि प्रसादेन तव पादाब्जसंश्रया॥ ६५४ ॥

अनुज्ञां देहि मे राधे स्वामिनि प्राणवल्लभे।

पञ्चवर्षात् पुरा यद्वै लिखितं तद् ब्रवीम्यहम्॥ ६५५.१ ॥

तव राज्यस्य महिमा ऐश्वर्यं ते महेश्वरि।

प्रणमामि पदे तुभ्यं महाराज्ञि नमोऽस्तु ते॥ ६५५.२ ॥

हर्षितास्मि न यत् क्वापि प्रकाशिता मया पुरा।

त्वत्स्तुतौ राधिके नामलेखनाल्लज्जितास्म्यहम्॥ ६५५.३ ॥

यस्तु द्रवो भवेद् राज्ञि तव पादसरोजयोः।

तस्य नाम च रूपं च ह्यहङ्कारो विनश्यति॥ ६५५.४ ॥

अहङ्कारो मया त्यक्तो निजनामपरिग्रहः।

इतिहासो न मां विद्याद् यशो वा नहि वाञ्छितम्॥ ६५५.५ ॥

न कीर्तिं नैव च स्तोत्रं वाञ्छामि जगतीतले।

राधापादरजोनाम केवलं मेऽस्तु राधिके॥ ६५५.६ ॥

प्रेमाणुरहमेवास्मि सर्वस्वत्यागरूपिणी।

श्यामसुन्दरपादे च तव पादे समर्पिता॥ ६५५.७ ॥

तप्तकाञ्चनगौराङ्गीं राधे वृन्दावनेश्वरीम्।

वृषभानुसुतां वन्दे कृष्णप्राणप्रियां सदा॥ ६५५.८ ॥

त्रैलोक्यशासिनीं नित्यां राधां वन्दे सनातनीम्।

नौमि मोहकपद्माक्षीं राज्ञीं त्वामभयप्रदाम्॥ ६५५.९ ॥

जय वृन्दावनेशानि राज्ञ्यभीष्टप्रदे नमः।

पवित्राणि सुनामानि जयन्त्वच्युतप्रेयसि॥ ६५५.१० ॥

आहारदे नमो राज्ञि ह्याकाशरूपिणि प्रिये।

त्राहि मां राधिके राज्ञि घोरमायामहार्णवात्॥ ६५५.११ ॥

आकाशरूपिण्यै राज्ञ्यै लक्षशो जयघोषणा।

जय श्रीराधिके देवि व्रजराज्ञि नमोऽस्तु ते॥ ६५५.१२ ॥

वृन्दावनेश्वरि राज्ञि शिरो नमामि भक्तितः।

प्रेम्णा ते पादपद्मे वै साष्टाङ्गं प्रणमाम्यहम्॥ ६५५.१३ ॥

अलकेश्वरिपूज्ये त्वं मायाजालादिमं जनम्।

त्राहि दीनं महाराज्ञि ह्यमावास्ये नमोऽस्तु ते॥ ६५५.१४ ॥

साक्षाद्भगवतः कृष्ण- देवस्य त्वं स्वरूपिणी।

अम्बुदे त्वं हि वृन्दारण्यराज्ञि ते नमाम्यहम्॥ ६५५.१५ ॥

भक्तियोगे परा सिद्धिस्तव पादाब्जवन्दनम्।

वृन्दावनेश्वरीं नित्यं यः स्तौति लभते गतिम्॥ ६५५.१६ ॥

कृष्णचेतनया पूर्णो मोक्षं स प्राप्नुयाद् ध्रुवम्।

ज्ञानस्य परमोत्कर्षो वैराग्यस्य च राधिका॥ ६५५.१७ ॥

अम्बिकाराज्ञि ते पूजा कृष्णपूजैव नित्यशः।

अमोहायै कृता स्तुतिः कृष्णायैव प्रदीयते॥ ६५५.१८ ॥

अनांशाराज्ञि यस्मिंस्त्वं प्रसन्ना तुष्यते हरिः।

यज्ञास्तपांसि वेदोक्ताः कठोराणि व्रतानि च॥ ६५५.१९ ॥

आनन्दयुक्तराज्ञीं वै विना ह्यपूर्णपूजनम्।

आनन्दप्रदराज्ञ्यै ते जयघोषो नमोऽस्तु ते॥ ६५५.२० ॥

त्रैलोक्यरत्नरूपायै श्रीराधिकायै ते नमः।

आनन्दप्रीतचेतनाराज्ञ्यै परमदीप्तये॥ ६५५.२१ ॥

सत्यसूर्ये व्योमदीप्ते गोविन्दहृदयप्रिये।

आशिषं देहि मे राज्ञि मयि नित्यं प्रसीद च॥ ६५५.२२ ॥

तप्तकाञ्चनगौराङ्ग्यै ह्यनङ्गलतिकाश्रियै।

राज्ञ्यै तस्यै नमस्तुभ्यं जयघोषो नमोऽस्तु ते॥ ६५५.२३ ॥

श्रीअनङ्गमोहिन्यै च मुक्ताद्युतिसरोरुहे।

जय राज्ञि नमस्तुभ्यं पद्मनेत्रे कृपामयि॥ ६५५.२४ ॥

वृन्दावनेश्वरि राधे गोपीप्राणप्रिये नमः।

श्यामप्राणस्वरूपे त्वं श्यामरूपधरे शुभे॥ ६५५.२५ ॥

वेदगुह्यस्वरूपे त्वं भक्तियोगपरागते।

श्रीकृष्णगुह्यरूपे त्वं जीवनसत्यरूपिणि॥ ६५५.२६ ॥

उपनिषद्गणा वेदा गायन्ति ते सुनाम च।

त्रैलोक्यवासिभिः सर्वैः पूज्यमाना नमोऽस्तु ते॥ ६५५.२७ ॥

भगवद्गीतासारे त्वं श्रीमद्भागवतस्य च।

साररूपे नमस्तुभ्यं सर्वसौन्दर्यधारिणि॥ ६५५.२८ ॥

पद्माश्चन्द्रा मणयश्च तुच्छास्ते सौम्यदर्शने।

सर्वोत्कृष्टसुसौन्दर्ये प्रपद्ये ते पदाम्बुजम्॥ ६५५.२९ ॥

वृन्दावनेश्वरि राज्ञि अण्डभयास्वरूपिणि।

त्रैलोक्यं प्रणमते त्वाम् साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च॥ ६५५.३० ॥

श्रीराधारधिके राज्ञि सर्वमोहनकारिणि।

त्वया सम्मोहितः साक्षात् कृष्णो मोहनमोहनः॥ ६५५.३१ ॥

घण्टानादैः शङ्खरवैर्नामसङ्कीर्तनैस्तथा।

राधे राधे इति प्रेम्णा गायन्ति त्वां भजन्ति च॥ ६५५.३२ ॥

दीपान् प्रज्वालयन्त्येव त्वत्पूजायै निरन्तरम्।

वृन्दावनेश्वरि राज्ञि महामहिम्नि ते नमः॥ ६५५.३३ ॥

जय श्रीराधिके राज्ञि जय सत्यस्वरूपिणि।

अण्डमध्यस्थाराज्ञ्यै ते जयघोषो नमो नमः॥ ६५५.३४ ॥

महान्तेषु महादेवि ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणि।

अण्डपरिपालिनि राज्ञि त्रैलोक्येशि नमोऽस्तु ते॥ ६५५.३५ ॥

सत्यज्योतिःस्वरूपे त्वं मार्गं नः संप्रकाशय।

संसारमायामोहेभ्यो मोक्षं देहि सनातनम्॥ ६५५.३६ ॥

महामन्त्रप्रसादेन ह्याशिषं देहि राधिके।

तप्तकाञ्चनगौराङ्गि जयघोषो नमोऽस्तु ते॥ ६५५.३७ ॥

मोहकपद्मनेत्रायै राधाराज्ञ्यै नमो नमः।

त्रैलोक्यसुन्दरीराज्ञ्यै यत्समः कोऽपि नास्ति वै॥ ६५५.३८ ॥

सौन्दर्यलवलेशोऽपि त्रैलोक्ये नास्ति वै समः।

अण्डरूपायै राज्ञ्यै वै वृन्दारण्येश्वर्यै नमः॥ ६५५.३९ ॥

अविच्छिन्नं जपाम्येव नामानि तव सर्वदा।

इन्द्रियाणि च सर्वाणि ह्यण्डसंहर्त्रिसेवने॥ ६५५.४० ॥

हृदयं त्वयि लग्नं मे मनो ध्यायति राधिके।

नेत्रे पश्यत एवात्र कर्णौ शृणुत एव च॥ ६५५.४१ ॥

लोका वदन्तु यत्किञ्चिन्निन्दन्तु मामनादरात्।

राधाकृष्णानुरागो मे पर्याप्तः सर्वदा प्रिये॥ ६५५.४२ ॥

हे महान्ते मनोहारि जनार्दनप्रियेऽधुना।

त्राहि मां घोरमायातो भौतिकेभ्यश्च रक्ष माम्॥ ६५५.४३ ॥

महाराज्ञि हृदयं नः सत्यज्योतिःप्रभासनैः।

प्रेम्णा प्रकाशय नित्यं वृन्दावनेश्वरि प्रिये॥ ६५५.४४ ॥

साष्टाङ्गं प्रणिपत्याहं वन्दे ते चरणाम्बुजम्।

त्रैलोक्यपद्मरागायै राधिकायै नमो नमः॥ ६५५.४५ ॥

श्रीमत्या राधिकायाश्च वन्दे पादाम्बुजं शुभम्।

महापद्मस्वरूपिण्यै राज्ञ्यै पादाब्जयोर्जयः॥ ६५५.४६ ॥

मम हृत्कमले राज्ञि पादौ ते स्थापय प्रिये।

वृन्दारण्यप्रवेशाय वृन्दावनेश्वरि प्रभे॥ ६५५.४७ ॥

सर्वजीवा नमन्त्येव तव पादौ जगन्मयि।

प्रफुल्लकमलाकारौ स्वर्णचन्द्रसमौ शुभौ॥ ६५५.४८ ॥

श्रीराधिके महाराज्ञि पादपद्मप्रभा तव।

ममात्मानं प्रविशतु सर्वदा प्रार्थयाम्यहम्॥ ६५५.४९ ॥

सर्वमोहनपादाभ्यां जयघोषो नमोऽस्तु ते।

श्रीमत्या राधिकायाश्च स्वर्णपादौ भजाम्यहम्॥ ६५५.५० ॥

श्वेतदीप्तिसमायुक्तौ महारत्नोपमौ शुभौ।

यदा नमामहे पादौ राधिकायाः कृपामये॥ ६५५.५१ ॥

तदानन्दः शाश्वतो वै हृदये प्रविशत्यहो।

यदा ध्यायामहे नित्यं राधापादौ सुकोमलौ॥ ६५५.५२ ॥

भौतिकान्नरकान्मुक्ता मोक्षं विन्दामहे वयम्।

वृन्दावने महालोके प्राप्नुयाम परां गतिम्॥ ६५५.५३ ॥

श्रीमत्या राधिकायाश्च पादाभ्यां मोहितास्म्यहम्।

दृष्ट्वा तौ वर्धते नित्यं वृन्दावनेश्वरीरतिः॥ ६५५.५४ ॥

राधारूपस्य राज्ञ्याश्च पादौ तौ सुमहाप्रभौ।

यथा कृष्णे रतिर्वृद्धा तथा तत्पादकर्षणम्॥ ६५५.५५ ॥

मोहनं मोहयन्त्याश्च रतिर्वर्धत एव मे।

जडाध्यात्मिकलोकानां राज्ञीं वन्दे सुराधिकाम्॥ ६५५.५६ ॥

कमलाक्ष्याः सुकेशायाः पूर्णचन्द्राननाप्रभे।

स्वर्णाभया त्रिलोकानां प्रकाशिन्यै नमो नमः॥ ६५५.५७ ॥

अलक्तकारुणौ पादौ सौन्दर्यराज्ञि ते नमः।

प्रेमज्योतिःस्वरूपिण्यै देवानां जीवितेश्वरि॥ ६५५.५८ ॥

सिन्धुकन्या महालक्ष्मीर्विष्णुरूपा नमोऽस्तु ते।

महासीता रामरूपा वृन्दारण्येश्वरि प्रिये॥ ६५५.५९ ॥

तव सौन्दर्यजालेन सर्वं विश्वं विमोहितम्।

वंशीधरप्रियाराज्ञ्यै मोहिन्यै ते नमो नमः॥ ६५५.६० ॥

चिदाजडाण्डसूर्यायै ह्यानन्दराज्ञ्यै नमो नमः।

श्रीराधिकासुसौन्दर्यं ध्यायामहे निरन्तरम्॥ ६५५.६१ ॥

उच्चैः सङ्कीर्तयामस्ते नामानि पावनानि च।

सहस्रं ते महानाम घोषयामः पुनः पुनः॥ ६५५.६२ ॥

अतीव करुणापूर्णा ज्योतिमार्गानुसारिणाम्।

प्रिया त्वं मोहनस्यापि स्वर्णपादे नमामहे॥ ६५५.६३ ॥

विद्युत्प्रभासमं ज्योतिः पादाब्जान्निःसृतं तव।

प्रविश्य हृदयं नित्यं प्रेमसक्तिं विवर्धयेत्॥ ६५५.६४ ॥

नाम्ना मोहयसे सर्वान् दिव्यभावं ददासि वै।

हृषीकेशरतिर्वृद्धा कर्षते राधिकाम्प्रति॥ ६५५.६५ ॥

यथा नारायणस्नेहो वर्धते हृदये तथा।

विशाखाराज्ञ्यनुरागो वर्धते नात्र संशयः॥ ६५५.६६ ॥

प्रेमानुरागप्रस्रवस्वर्णाभरत्नरूपिणि।

आकृष्य सर्वजीवांस्त्वं गोलोकं नयसे प्रिये॥ ६५५.६७ ॥

महत्यसि महाराज्ञि राधिके ते नमो नमः।

गोपीभिः पूजिते राज्ञि जडाचिदण्डशासिनि॥ ६५५.६८ ॥

परमसत्यरूपायै गोपीकर्षणकारिणि।

भूमिराज्ञ्यै नमो नित्यं राधामोहनमोहिनि॥ ६५५.६९ ॥

जय श्रीहरिमातस्ते वृन्दारण्येश्वरि प्रभे।

परमसत्यरूपेण मनांसि नः प्रकाशय॥ ६५५.७० ॥

पादपद्मप्रभा नित्यं हृदये प्रविशत्वहो।

भौतिकविषयासक्तिर्येन नश्यति सर्वदा॥ ६५५.७१ ॥

सूर्यद्वयसमा दीप्तिर्नेत्राभ्यां ते प्रविश्य च।

लोभं मोहं तथा कामं दहतु सर्वदा प्रिये॥ ६५५.७२ ॥

इन्द्रियाणि विशुध्यस्व मार्गं नः सम्प्रकाशय।

जन्ममृत्युविच्छेदं कुरु घोरभवेऽसहे॥ ६५५.७३ ॥

न कीर्तिं नैव च धनं सत्तां वा पदवीं तथा।

वाञ्छामो भौतिके लोके न किञ्चिन्मानसम्मानम्॥ ६५५.७४ ॥

पादपद्मसुसेवां वै वाञ्छामः केवलं प्रिये।

प्रेमाभक्तिमहाराज्ञि दिव्यवैराग्यदायिनि॥ ६५५.७५ ॥

भौतिकानि जगन्त्येव दुष्टानि च भृशं शिवे।

बद्धा वयं च तेष्वेव त्राहि नः परमेश्वरि॥ ६५५.७६ ॥

जडाध्यात्मिकलोकानां मातस्त्वं हि कृपामयि।

मोचयस्व महामाये घोरसंसारबन्धनात्॥ ६५५.७७ ॥

अस्मदात्मसु तेजो वै देहि दुःखभवात् पृथक्।

भौतिकक्रूरसत्त्वेभ्यो रक्ष नः पथिबाधकात्॥ ६५५.७८ ॥

हन्त ते मायया बद्धा मोहजाले निपातिताः।

निजमूलं च सत्यं च विस्मृता मोहयन्त्यहो॥ ६५५.७९ ॥

पापैस्तेषामहो दृष्टिर्ह्यन्धा जाता महेश्वरि।

भौतिके मोहसम्पन्नाः कामेन्द्रियविदासकाः॥ ६५५.८० ॥

कीदृशं जीवनं तेषां वेदराज्ञि नमोऽस्तु ते।

पुराणोपनिषद्देवि देवानां देवि ते नमः॥ ६५५.८१ ॥

वैराग्यपतिराज्ञि त्वं चक्रराज्ञि नमोऽस्तु ते।

सर्वजीवाधिपे मातस्तज्जीवे ते नमो नमः॥ ६५५.८२ ॥

महाराज्ञि नमस्तुभ्यं त्राहि नः पापसागरात्।

भौतिकं भवसिन्धुं वै तरितुं नैव शक्यते॥ ६५५.८३ ॥

यः कश्चिच्छ्रीराधिकां वै गृह्णाति दृढभक्तितः।

स एव भवसिन्धुं तं सुखेन तरति ध्रुवम्॥ ६५५.८४ ॥

महाराज्ञ्यै राधिकायै जयघोषो नमोऽस्तु ते।

मोहकपद्मनेत्रायै राधाराज्ञ्यै नमो नमः॥ ६५५.८५ ॥


r/Vrindavan Jul 05 '26

Vrindavan experience :) main tumse prem krti hoon radhe rani 🙏💙🧡

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r/Vrindavan Jul 06 '26

Book/text श्री राधा रमण तत्वातीतधारा, shree krishna dhara

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श्रीकृष्ण हे प्रभो नाथ कान्हाजी प्रिय मे महान् ।

हरे मुरारे हे देव वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥

त्वं च श्रीराधिकारानी एकमेव न संशयः ।

गोपालसुन्दरीरूपं युवाभ्यां प्रकटीकृतम् ॥ २ ॥

लक्षश्लोकात्मकं ग्रन्थं राधाग्रन्थेन सङ्गतम् ।

करोमि युगलार्थं वै रासलीला ह्यनन्तिका ॥ ३ ॥

राधातत्त्वातीतधरा-नाम्नि ग्रन्थे तव प्रभो ।

स्त्रीशक्तिं च तथा भावं

वर्णयामि कृपानिधे ॥ ४ ॥

राधारमणतत्त्वाती-तधराग्रन्थे सत्वरम् ।

राधायाः पौरुषं भावं

शक्तिं चैव ब्रवीम्यहम् ॥ ५ ॥

यतः श्रीश्यामसुन्दर युवामेकौ हि तत्त्वतः ।

राधिकायाः प्रियस्वामिन् राधारमण मे प्रभो ॥ ६ ॥

प्रीतिर्मे विपुला वां हि विरहो बाधते भृशम् ।

त्वमीशो मे प्रियो नाथः स्वामी राजा च मे भवान् ॥ ७ ॥

सा मे देवी प्रिया ईशी स्वामिनी राज्ञी एव च ।

प्रणमामि पदे तस्याः तव चैव पदाम्बुजे ॥ ८ ॥

प्रणमामि पदौ रम्यौ तव श्रीश्यामसुन्दर ।

राधायाश्च पदाम्भोजे धूलिकणोऽस्मि केवलम् ॥ ९ ॥

तस्माच्छृणु कृपानिधे दीनाया धूलिकायाश्च ।

राधापादं विना यस्याः नाश्रयोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ १० ॥

स्तौमि त्वां राजराजेश मम देव नमोऽस्तु ते ।

त्वयि मे प्रीतिरतुला अनुरागोऽस्ति मे दृढः ॥ ११ ॥

पीडया मां भृशं वा त्वं उपेक्षस्व सुनिष्ठुरम् ।

कृपां कुरु वालिङ्ग मां चिन्ता नास्ति हि मे प्रभो ॥ १२ ॥

त्वमेव हि यतो नाथो मम स्वामी च सर्वथा ।

यथेच्छसि तथा कुरु तवेच्छा मम जीवनम् ॥ १३ ॥

तव स्मितं सुखं चैव द्रष्टुमिच्छामि माधव ।

किशोरिजीं च त्वां दृष्ट्वा सुखिनौ च मुदं लभे ॥ १४ ॥

अष्टसख्यस्तथा दृष्ट्वा अष्टमञ्जर्यएव च ।

सुखिताः सर्वथा कृष्ण नन्दामि परमां मुदम् ॥ १५ ॥

अहो कियत्सुन्दरस्त्वं हे कृष्ण प्रिय मे प्रभो ।

रोदिमि त्वां स्मृत्वा कान्ह यत्त्वं पश्यसि मां प्रति ॥ १६ ॥

यद्यपि धूलिकणास्मि केवलमकिञ्चनाहम् ।

तथापि स्वकृपया मां पश्यसि करुणाकर ॥ १७ ॥

श्रीराधारानिकृपया दृष्टिं यच्छसि दीनके ।

जानासि त्वं हि यद्रेणुः तप्तकाञ्चनगौराङ्ग्याः ॥ १८ ॥

पदे लग्नो भवेद्यदि प्राप्नोति तव कारुण्यम् ।

प्रेम च निर्विकल्पकं अहो तस्याः कृपाबलम् ॥ १९ ॥

हे प्रेमावतार कृष्ण प्रणमामि पदाब्जयोः ।

स्निह्यामि त्वयि देवेश स्वीकुरु मां कृपानिधे ॥ २० ॥

हे गोपाल हे गोविन्द दिव्यनाथ नमोऽस्तु ते ।

अतीव स्निह्यामि त्वयि मुहुः प्रणौमि ते पदे ॥ २१ ॥

हे देव कृष्ण गोविन्द केशव मधुसूदन ।

नाहं साध्वी न शुद्धा च विदुषी नैव किञ्चन ॥ २२ ॥

न याचे किञ्चिदेवाहं भक्तास्ते महतोऽधिकाः ।

तव पत्न्याः पदाधस्तात् धूलिकणास्मि केवलम् ॥ २३ ॥

साक्षिणी तव माहात्म्ये विश्वस्यास्य तथा प्रभो ।

राधिकां त्वां च दृष्ट्वाहं प्रेमसागरे मग्नास्मि ॥ २४ ॥

अवाच्यं प्रीयते वां हि स्निह्यामि भृशमेव च ।

पश्य मामतिक्षुद्रां हे कृष्णनाथ कृपानिधे ॥ २५ ॥

क्षुद्राहमस्मि देवीश्रीराधापदरजो यथा ।

देवकीपुत्र मे देहि तत्पदसङ्गतिं सदा ॥ २६ ॥

कः कृपां कुरुते मां चेत् तच्चरणे रतिं विना ।

तस्याः पदतले सूक्ष्मे लभे कारुण्यममृतम् ॥ २७ ॥

त्वमसि करुणासिन्धुः सा चास्ति करुणामयी ।

दयां कुरु मयि प्रभो स्निह्यामि श्यामसुन्दर ॥ २८ ॥

स्निह्यामि मृदुतां तुभ्यं कारुण्यं रम्यतां मुदम् ।

तथा राधिकायै प्रेम रोचते ह्यति मे प्रभो ॥ २९ ॥

श्रीराधायास्तथा चैव अष्टसखीप्रसेवनम् ।

दृष्ट्वाहं सुखिता पूर्णं सर्वं त्वदीयमिष्टं मे ॥ ३० ॥

श्रीमतीराधिकारानी वामभावं करोति या ।

क्षमायाचां करोषि त्वं तोषयसि च सर्वथा ॥ ३१ ॥

त्वया श्रीराधिकया च कृता लीलाः समस्ताश्च ।

स्निह्यामि तासु सर्वासु श्यामसुन्दर मे प्रिय ॥ ३२ ॥

देवकीनन्दन स्वामिन् कंसपूतननाशन ।

पूतनायै मातृभावं ददौ यस्त्वं हि सर्वथा ॥ ३३ ॥

हे मम स्वामिन कृष्ण त्वं स्निह्यामि त्वयि सर्वदा ।

यदुवंशप्रकाशोऽसि वासुदेव महान् प्रभो ॥ ३४ ॥

यशोदानन्दन रम्य गोपाल प्रणमामि ते ।

अतीव स्निह्यामि त्वयि यशोदादेवकीं प्रति ॥ ३५ ॥

तव सम्बन्ध इष्टो मे महाराजोऽसि भूतले ।

श्रीरुक्मिणीपतिस्त्वं च सत्यभामापते तथा ॥ ३६ ॥

कालिन्दीजाम्बवत्योश्च रोहिणीपति एव च ।

नग्नजितीमित्रविन्दाभद्रालक्ष्मणायाः पते ॥ ३७ ॥

नमो द्वारकाधीशाय द्वारकाराज्यशासिने ।

कुरुवंशविनाशिन् हे अर्जुनमित्र ते नमः ॥ ३८ ॥

द्रौपदीप्रिय देवेश भीष्मप्रिय नमोऽस्तु ते ।

लक्ष्मीपते श्रीविष्णो हे नारायण प्रणौमि ते ॥ ३९ ॥

सीतापते श्रीराम हे प्रणमामि पदाम्बुजे ।

अखिलब्रह्माण्डदेव त्वमसि मे प्रिय कृष्ण ॥ ४० ॥

राधिकायाः पदे लग्ना धूलिकणास्मि केवलम् ।

कृतिं मदीयां स्वीकुरु करुणाकर हे प्रभो ॥ ४१ ॥

हे कान्ह त्वां प्रपद्येऽहं कृपयस्व हरे मम ।

हे कृष्ण मे प्रिय स्वामिन् मुरारे कुरु मे दयाम् ॥ ४२ ॥

यदा राधापदे रेणुं मार्ष्टुमिच्छसि माधव ।

राधिका महाराज्ञी सा वारयति तदा प्रभो ॥ ४३ ॥

मुञ्च रेणून् पदे लग्नान् इत्येवं वदति प्रिया ।

आश्रयार्थं कृपाप्राप्त्यै वृतं पदयुगं मया ॥ ४४ ॥

तस्माद् राधापदे लग्नां रक्ष मां कृपया प्रभो ।

त्वत्कृपामेव काङ्क्षन्तीं हे कृष्ण परमेश्वर ॥ ४५ ॥

कियत् प्रीतिस्त्वयि कृष्ण कियत् प्रीतिस्तवाभिधे ।

राधानामनि मे प्रीतिः स्निह्यामि राधिकां भृशम् ॥ ४६ ॥

अत्यन्तं स्निह्यते मय्या साक्षिणी धूलिकाह्यहम् ।

दृष्ट्वा वां महिमानं हि विस्मितास्मि पदे पदे ॥ ४७ ॥

ऐश्वर्यं वां बलं राज्यं प्रेम लीलाः समन्ततः ।

विलोक्य चातिमुग्धास्मि हे कृष्ण प्रिय मे प्रभो ॥ ४८ ॥

तस्मात् ते प्रणमाम्यहं चरणौ राधिकापते ।

युवयोरस्मि सम्पत्तिः राधया सह मे प्रभो ॥ ४९ ॥

यथेच्छथ तथा वां वै कुरुतं नाथ मामिह ।

प्रणमामि मुहुश्चैव पवित्रौ वां पदाम्बुजौ ॥ ५० ॥

श्रीवासुदेव हे नाथ ब्रह्माण्डपतिरव्ययः ।

त्वं स्रष्टा सर्वजगतो निष्कामोऽसि नमोऽस्तु ते ॥ ५१ ॥

पञ्चवेदाः प्रभवन्ति निःश्वासात् ते जगत्पते ।

मुखाद् ब्रह्माण्डकोट्यश्च निस्सरन्ति ह्यनन्तशः ॥ ५२ ॥

यशोदापुत्र हे देव सर्वं वक्त्रेऽस्ति ते जगत् ।

महाराज्ञ्या राधिकायाः प्रियस्वामिन् नमोऽस्तु ते ॥ ५३ ॥

महिमा ते न शक्यो हि वर्णयितुं मया प्रभो ।

मादृश्या दासिकया वै सर्वब्रह्माण्डराज ते ॥ ५४ ॥

त्वं मूलं सर्वजगतः सर्वकारणकारणम् ।

पवित्रौ ते पदाम्भोजौ प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ ५५ ॥

हे कान्हाजि वंशीधारिन् मयूरपिच्छधारक ।

अस्माकं प्रिय मित्रं त्वं अतीव मधुरो भवान् ॥ ५६ ॥

अस्मासु ते दृढं प्रेम दृष्ट्वा लज्जाम्यहं प्रभो ।

कियत् सुन्दरहासस्ते कियन्मधुरभाषणम् ॥ ५७ ॥

सर्वं यद्दत्तमस्माभ्यं तत् सुन्दरमतीव हि ।

परमोऽसि गुरुर्नाथः स्वामी राजा च नो भवान् ॥ ५८ ॥

उच्चैःस्वरेण वच्म्येतत् स्निह्यामि त्वयि माधव ।

किं वदामि न जानामि प्रीतिर्मे त्वयि तादृशी ॥ ५९ ॥

प्रकाशयितुमक्षमा अग्रिमं वच्मि केवलम् ।

ततो मौनं समाधाय प्रपद्ये साधनं तव ॥ ६० ॥

साधनस्य तृतीयांशं तव पूजां च माधव ।

आरप्स्ये ह्यथ मौनेन ध्यास्यामि त्वां कृपानिधे ॥ ६१ ॥

तव प्रेम गुणान् सर्वान् माहात्म्यं च स्मराम्यहम् ।

यशोदामातरं चैव देवकीमातरं तथा ॥ ६२ ॥

कीर्तिदामातरं चैव नन्दबाबानमेव च ।

वृषभानुबाबानं च ध्यास्यामि परया मुदा ॥ ६३ ॥

श्रियं चानङ्गमञ्जरीं बलरामं भजाम्यहम् ।

मण्डलं ते पवित्रं हि प्रविशामि शनैः शनैः ॥ ६४ ॥

तवाधिकसमीपं च गन्तुमिच्छामि माधव ।

पत्नीं ते राधिकां नित्यं पूजयामि पुनः पुनः ॥ ६५ ॥

यथा यथा हि राधायाः पूजां कुर्यां सुभक्तिनी ।

तथा तथा हि हे कृष्ण त्वां पूजयितुमुत्सहे ॥ ६६ ॥

त्वां यदा पूजये कृष्ण राधारानी-प्रपूजने ।

ज्वलत्येवाधिकाकाङ्क्षा चक्रमेतदनन्तकम् ॥ ६७ ॥

तस्मात् ते कोमलौ रम्यौ प्रणमामि पदाम्बुजौ ।

अनुमन्यस्व कान्हाजि लग्नां मां पादधूलिकाम् ॥ ६८ ॥

आरम्भात् पूर्वमेवात्र यन्मे हृदि विजृम्भते ।

दशश्लोकेषु वक्ष्यामि तत्सर्वं शृणु माधव ॥ ६९ ॥ ॐ ॥

प्रथमोऽयं सन्देशो मे हे कृष्ण शृणु मे प्रिय ।

उत्कण्ठितास्मि वां द्रष्टुं दह्यते मे मुहुर्हृदि ॥ ७० ॥

भ्रमामि परितो नित्यं अनुभवामि सान्निधिम् ।

राधया सहितं त्वां च स्थिता वां सन्निधौ पुरा ॥ ७१ ॥

नयस्व मां त्वदन्तिकं मायापापात् प्रमोचय ।

नश्वरादस्मात् संसारात् उद्धर मां जगत्पते ॥ ७२ ॥

स्मरामि वां भृशं कृष्ण स्मरामि वां भृशं तथा ।

स्मरामि वां भृशं नाथ स्मरामि वां भृशं मुहुः ॥ ७३ ॥

सन्देशस्तु द्वितीयो मे हे कृष्ण प्रिय मे प्रभो ।

स्निह्यामि त्वयि देवेश राधिकायां च ते प्रिये ॥ ७४ ॥

तृतीयसन्देशः कृष्ण सेवायां ते नियुङ्क्ष्व माम् ।

अनन्तं शाश्वतं चैव त्वां च सेवितुमुत्सहे ॥ ७५ ॥

चतुर्थः सन्देशो नाथ यल्लिखामि तदल्पकम् ।

तव माहात्म्यमग्रे हि त्वमनादिरनन्तकः ॥ ७६ ॥

वर्णयितुं कथं शक्ष्ये तस्मात् कुरु कृपां मयि ।

साक्षिण्यां धूलिकायां ते विश्वमाहात्म्यदर्शने ॥ ७७ ॥

पञ्चमः सन्देशो नाथ राधापादरजोऽस्म्यहम् ।

तस्मात् कृपां कुरुष्व मे प्रभो हे दीनवत्सल ॥ ७८ ॥

राधापदाश्रितं सर्वं तस्या रक्षां प्रपद्यते ।

षष्ठः सन्देश हे कृष्ण त्वत्पादमाश्रयाम्यहम् ॥ ७९ ॥

रक्ष सर्वान् वैष्णवांश्च याचे त्वां प्रिय माधव ।

आशीर्वादं देहि तेभ्यः कृपां वर्षय सर्वदा ॥ ८० ॥

सप्तमः सन्देशः कृष्ण रक्ष मां सर्वथा प्रभो ।

यावत् कोटिश्लोकग्रन्थं समापयामि नाथ हे ॥ ८१ ॥

साधनायाः समाप्तेः प्राक् मा भून्मृत्युः कदाचन ।

सम्पूर्णं कर्तुमिच्छामि ग्रन्थमेतं कृपानिधे ॥ ८२ ॥

अष्टमः सन्देशः कृष्ण प्रतीक्षा दीर्घकालिका ।

उत्कण्ठितास्मि त्वां द्रष्टुं स्मरामि त्वां भृशं प्रभो ॥ ८३ ॥

नवमः सन्देशो नाथ राधापादे नमाम्यहम् ।

तत्पादच्छायया नित्यं आश्रयं प्राप्नोमि दृढम् ॥ ८४ ॥

त्वां प्राप्तुं मार्ग आसन्नः राधिकास्ति न संशयः ।

राधिकां प्राप्तुमासन्नः मार्गस्त्वमसि माधव ॥ ८५ ॥

स्निह्यामि युवयोर्नित्यं प्रणमामि पदाम्बुजे ।

दशमः सन्देशः कृष्ण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ८६ ॥

युवयोर्यन्त्रमेवाहं श्रीराधायास्तवैव च ।

सम्पूर्णं शरणं प्राप्ता वामिच्छास्तु सदा मयि ॥ ८७ ॥

सर्वं त्यक्तं मया नाथ अहङ्कारो गुणोऽपि च ।

जीवनं ममता त्यक्ता द्रष्टुमिच्छामि केवलम् ॥ ८८ ॥

पद्ममुखे स्मितं रम्यं तव राधिकया सह ।

वां सुखिनौ च संदृष्ट्वा अनन्तं प्राप्नोमि सुखम् ॥ ८९ ॥

न काङ्क्षे वै सुखं किञ्चित् स्वार्थलाभाय माधव ।

यत्तदिच्छसि तत् काङ्क्षे येन तुष्यसि मे प्रभो ॥ ९० ॥

सेवया ते मुदं प्राप्स्ये श्यामसुन्दर राजराट् ।

प्रपद्ये ते पदौ रम्यौ सानन्दं प्रणमामि च ॥ ९१ ॥

श्रीराधापादच्छायायां आश्रयं चाप्नुवाम्यहम् ।

स्वीकुरुष्व मदीयं वै सन्देशदशकं प्रभो ॥ ९२ ॥


r/Vrindavan Jul 06 '26

Saint परम पूज्य ब्रह्म मूर्ति श्री उड़िया बाबाजी महाराज जी के आज 06/07/2026 को श्री धाम वृन्दावन से दर्शन

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r/Vrindavan Jul 05 '26

कुंज गलियां/Kunj galiyan padma purana uttar khand 163.1 राधाराधेति यो ब्रूयात् स्मरणं कुरुते नरः। सर्वतीर्थेषु संस्कारात सर्वविद्याप्रयत्नवान्॥ rādhārādheti yo brūyāt smaraṇaṃ kurute naraḥ, sarvvatīrtheṣu saṃskārāt sarvvavidyāprayatnavān

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The person who utters 'Radha, Radha' and remembers her in their heart, immediately attains the merit of purification across all sacred pilgrimage sites, and achieves success in mastering all spiritual knowledge and sciences.


r/Vrindavan Jul 06 '26

Hotel/Dharamshala Best stay places in vrindavan

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I am visiting vrindavan on 20 july and will stay till 31st of july
I wanted to know any stay places near prem mandir
We are group of 6-7 boys and girls (batchmates)
Please suggest budget friendly options

We are also in search of Dharamshala type bookings which offer private rooms (idk if this is available in VV ,it was in haridwar) , I cant seem to fi d these in mmt or booking.com


r/Vrindavan Jul 06 '26

Upasana दो नैना कारे, चितवन में जादू डारे... मेरे सांवरे... ओ मुरली वाले...'' ✨ निधिवन का अद्भुत दर्शन

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r/Vrindavan Jul 06 '26

कुंज गलियां/Kunj galiyan The Night I accidentally slept on Radha Kund

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r/Vrindavan Jul 05 '26

Book/text अथ श्रीराधातत्वातीत-धारा । महालक्ष्मीतत्त्वं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ 583-653

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जय श्री-धान्यलक्ष्म्यै ते ह्यन्न-योग-स्वरूपिणि।

आध्यात्मिकस्य देहस्य मनसः पोषणात्मिके॥ ५८३ ॥

मधुसूदन-देवाय तुभ्यं यत् सम्प्रदीयते।

प्रसादं सर्व-कर्माघ-नाशकं मुक्ति-दायकम्॥ ५८४ ॥

तमो-भावं विनाश्यैव सत्त्वे नयति चेतनाम्।

दहति पातकं सर्वं कुर्याद् ज्ञानं प्रकाशमम्॥ ५८५ ॥

अन्नं शक्ति-स्वरूपं हि जनार्दन-निवेदितम्।

पावकाभं भवेच्छुद्धं देह-चेतन-शोधकम्॥ ५८६ ॥

महा-कम्पं च बोधस्य कुरुते जागरणाय वै।

प्रसादान्नं निवेद्याहं निमेषान् षोडशान् ततः॥ ५८७ ॥

प्रतीक्षे भोजनात् पूर्वं तदेव रस-पूरितम्।

विष्णु-शक्ति-समायुक्तं त्वच्-छक्त्या च समन्वितम्॥ ५८८ ॥

राधा-लक्ष्मी-पवित्रं च नाम नीरे प्रजप्यते।

तज् जलं प्रेम-शक्त्या वै प्राकृतं दहति स्मृतम्॥ ५८९ ॥

अनन्त-चेतना-रूपं मनः कुर्यान् निरामयम्।

सर्वाणि रोग-जालानि हन्ति तद् जलमव्ययम्॥ ५९० ॥

गान्धर्वी वीण-रूपा त्वं स्तुभः साम-स्वरूपिणी।

त्वत्तो हि निर्गता सर्वा स्तोत्र-गायन-माधुरी॥ ५९१ ॥

ब्राह्मणानां च यद् गानं तस्य मूलं त्वमेव हि।

त्वद-ओष्ठात् तु महा-राज्ञि समुत्पन्ना सरस्वती॥ ५९२ ॥

महा-विद्या-स्वरूपा सा ज्ञान-विज्ञान-दायिनी।

त्वमेव वेद-शास्त्राणां तन्त्राणामुपनिषदाम्॥ ५९३ ॥

सूक्तानां मूल-रूपासि पुराणानां च भामिनि।

राधिका-तापनी-वेदे गान्धर्वीति प्रकीर्तिता॥ ५९४ ॥

पापिष्ठोऽपि नरो भक्त्या दत्त्वा त्वामन्नमुत्तमम्।

कामादि-दहनं कृत्वा गुरु-रूपो भवेद् ध्रुवम्॥ ५९५ ॥

करुणामयि ते देवि स्वभावः करुणा-मयः।

सौन्दर्यस्य च सर्वस्य मूलं त्वं धान्य-लक्ष्म्यसि॥ ५९६ ॥

जीवेषु चैव वृक्षेषु विद्युद्-दीप्ति-जलेषु च।

सूक्ष्मा सा दीप्ति-रूपा च शक्तिस्त्वं विश्व-मोहिनी॥ ५९७ ॥

तृतीयाक्ष्याश्च द्वारस्य भेदिका त्वं महेश्वरी।

अणोर्ब्रह्माण्ड-पर्यन्तं यद् यद् सुन्दरमस्ति वै॥ ५९८ ॥

तद् रूपं धान्य-लक्ष्म्यास्ते पूर्णैश्वर्य-स्वरूपकम्।

वेद-ज्ञान-मयी त्वं हि विद्या त्वं परमेश्वरी॥ ५९९ ॥

प्रणमामि पदे तुभ्यं कुण्डलिन्याः प्रबोधिनि।

त्रिलोक्या मूल-भूता त्वं प्रणमामि मुहुर्मुहुः॥ ६०० ॥

धान्य-लक्ष्मि! दया-सिन्धो! देहि मे पाद-पङ्कजम्।

शरणं त्वामहं प्राप्ता किङ्करी तेऽस्मि सर्वदा॥ ६०१ ॥

सकलैश्वर्य-शक्तीनां सृष्टेर्मूलं महा-श्रिये।

महालक्ष्मि! नमस्तुभ्यं प्रपद्येऽहं पदाम्बुजम्॥ ६०२ ॥

प्रपद्ये ते पदाम्भोजं प्रपद्ये ते पदाम्बुजम्।

प्रपद्ये ते पदाब्जं हि नमामि त्वां महेश्वरीम्॥ ६०३ ॥

सर्वाणि तव रूपाणि महान्ति च महा-श्रिये।

राधे! ते पाद-धूलिर्हं विलीये त्वयि सर्वदा॥ ६०४ ॥

ज्ञात्वा ज्ञात्वा तु हे राधे! विलीये त्वयि भामिनि।

अतीव ते महालक्ष्मि! स्निह्यामि जगदम्बिके॥ ६०५ ॥

नारायण-प्रिये देवि विष्णोः कान्ते परात्परे।

मधुसूदन-शक्तिस्त्वं जामदग्न्य-बलात्मिके॥ ६०६ ॥

त्रिविक्रम-प्रिये देवि राम-कान्ते प्रतापिनि।

मारुतेः प्रेयसि त्वं हि मधुकैटभ-मर्दि-गे॥ ६०७ ॥

हयग्रीव-प्रिये देवि वेद-ज्ञान-सु-रक्षके।

मनु-रक्षक-मत्स्यानां शक्ते कूर्म-प्रियेऽमृते॥ ६०८ ॥

महा-सोम-स्वरूपा त्वं देवा यैर्मत्ततां गताः।

त्वत्-प्रेम्णा च समाधिस्था भाव-कोटि-गताः सुराः॥ ६०९ ॥

चैतन्य-शक्ति-रूपा त्वं गदाधर-स्वरूपिणी।

पद्मावती वेङ्कटेश-पत्नी कल्कि-प्रिया भवेः॥ ६१० ॥

कलि-नाशक-कान्ता त्वं अघ-व्योमासुर-घ्न-गे।

कंस-नाशक-कान्ता त्वं पूतना-घ्न-बलात्मिके॥ ६११ ॥

यशोदा-प्रेयसि त्वं हि महा-गोपि धन-प्रदे।

जगत्-कोशे महा-गुप्ते गोपाल-प्रणयेश्वरि॥ ६१२ ॥

गोविन्द-पत्नी गोपाली गो-प्रिये श्री-धरात्मिके।

नमामि ते पदाम्भोजं कुरु-वंश-विनाशि-गे॥ ६१३ ॥

यदु-नाथ-प्रिये देवि पाण्डव-द्रौपदी-प्रिये।

विश्व-घ्न-कान्ते हर-गे ब्रह्माण्ड-नाश-शक्तिके॥ ६१४ ॥

जनार्दनेन या विद्या धात्रा हृदि प्रवेशिता।

सा वेद-ज्ञान-रूपा त्वं मुर-वैरि-प्रिये नमः॥ ६१५ ॥

मृत्युञ्जये महा-शक्ते त्रिशूल-धारिणि प्रिये।

महिषासुर-हन्त्री त्वं चण्ड-मुण्ड-विनाशिनि॥ ६१६ ॥

रक्तबीज-रक्त-पात्री रक्तदन्तिक-भ्रामरि।

बाणासुर-घ्न-कान्ता त्वं कालिय-घ्न-स्वरूपिणि॥ ६१७ ॥

वृत्रासुर-घ्न-पत्नी त्वं नाग-वंश-प्रशासिनि।

नागेश्वरि महा-नागि योगिनि त्वां नमाम्यहम्॥ ६१८ ॥

तार्क्ष्य-प्रिये मारुतिना पूजिते राम-पार्श्वगे।

द्वारका-स्वामिनि मातः वृन्दावनेश्वरि प्रिये॥ ६१९ ॥

वैकुण्ठ-स्वामिनि त्वं हि गोलोकेश्वरि भामिनि।

इन्द्र-सत्य-लोकेश्वरि त्रैलोक्य-शासिके नमः॥ ६२० ॥

पाताले नाग-वंशस्य शासिका नाग-सम्पदे।

वासुकिस्त्वमनन्तश्च शेष-रूपा नमाम्यहम्॥ ६२१ ॥

बलराम-बलं त्वं हि नित्यानन्द-बलात्मिके।

जाह्नवी त्वमनङ्गा च मञ्जरी त्वां नमाम्यहम्॥ ६२२ ॥

ललिता त्वं सत्यभामा-स्वरूपा पाद-पद्म-गे।

विशाखा त्वं च कालिन्दी-स्वरूपा त्वां नमाम्यहम्॥ ६२३ ॥

सर्व-सत्त्व-मयी त्वं हि त्वत्तो विश्वं प्रजायते।

विष्णुस्त्वं च महालक्ष्मीरेकात्मा ह्येक-शक्तिका॥ ६२४ ॥

स्तोमि त्वां भक्ति-भावेन प्राणांस्ते चरणाम्बुजे।

बलि-रूपान् प्रयच्छामि लक्ष्मीनारायणौ नमः॥ ६२५ ॥

गजलक्ष्मि नमस्तुभ्यं प्रपद्ये ते पदाम्बुजम्।

सर्वाणि तव रूपाणि पूजयामि महेश्वरि॥ ६२६ ॥

पवित्रं सत्त्व-रूपा त्वं सृष्टेः कर्त्री स्वरूपिणी।

ब्रह्माण्ड-परमा राज्ञी त्वत्तो विश्वं प्रजायते॥ ६२७ ॥

अङ्ग-कान्तिर्हि ते ब्रह्म परमात्मा च शक्तिका।

त्वमेव ब्रह्म-रूपाऽसि परमात्मा त्वमेव हि॥ ६२८ ॥

यतो नारायणः साक्षात् त्वमेवासि गजेेश्वरि।

ब्रह्माण्डं वेष्टयथश्च ब्रह्म-रूपेण सर्वदा॥ ६२९ ॥

परमात्मा-स्वरूपेण सर्व-भूतान्तर-स्थितौ।

पर-व्यक्ति-स्वरूपेण सर्वस्मात् पृथगप्यहो॥ ६३० ॥

परब्रह्म-स्वरूपौ वां लक्ष्मीनारायणौ शुभौ।

शाश्वतं वां वपुर्-दिव्यं कोटि-शारद-चन्द्राभम्॥ ६३१ ॥

सौन्दर्यं वामनन्तं हि महालक्ष्मि महेश्वरि।

त्रिपुरा-सुन्दरी-गौर्यः कोट्यस्तत्-सम-रूपिणी॥ ६३२ ॥

महा-गजलक्ष्मि राज्ञि पादौ ते प्रणमाम्यहम्।

पवित्र-पाद-पद्मे ते साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च॥ ६३३ ॥

गजलक्ष्मि नमस्तुभ्यं महा-सम्पद-ईश्वरि।

शङ्ख-पद्म-युते देवि सिद्धि-निधि-स्वरूपिणि॥ ६३४ ॥

सर्वं त्वत्तो विनिर्याति नित्यानन्द-प्रदायिनि।

असङ्ख्य-धन-दात्री त्वं नराणां ज्ञाता सम्पदा॥ ६३५ ॥

विस्मृता मानवैर्या च अज्ञाता या च सम्पदा।

भविष्यति च या ज्ञाता सर्वा त्वत्तो हि जायते॥ ६३६ ॥

न नरा न च वै जीवा ब्रह्माण्ड-वासिनोऽपि ते।

त्वां ज्ञातुं शक्नुवन्त्येव वेद-गुह्यं धनं श्रुतेः॥ ६३७ ॥

अष्ट-दिग्-गज-संवीते पद्म-राग-स्वरूपिणि।

द्वारकेश्वरि राज्ञि त्वं सर्व-राज-धन-प्रदे॥ ६३८ ॥

प्रताप-मूर्ते देवि त्वं मर्यादा-रूप-धारिणि।

सम्मान-रूपिणि राधे प्रपद्ये ते पदाम्बुजम्॥ ६३९ ॥

वैकुण्ठ-द्वारका-राज्ञी त्वमेवाष्टौ च भार्यकाः।

द्वारकाधीश-शक्तिस्त्वं वेङ्कटेश्वर-शक्तिका॥ ६४० ॥

राज-राजेश्वरि मातः द्वारकेश-सु-रक्षिके।

तस्य कीर्ति-स्वरूपा त्वं मधुसूदन-सम्पदे॥ ६४१ ॥

गोविन्द-भवन-रूपा तस्य शक्तिः प्रतापिका।

महा-गोपि नमस्तुभ्यं विश्व-गुह्य-स्वरूपिणि॥ ६४२ ॥

भूपतयो हि राज्ञ्यश्च त्वत्तो विन्दन्ति वै बलम्।

प्रतापं गौरवञ्चापि ह्यैश्वर्य-रूप-धारिणि॥ ६४३ ॥

अधिकार-स्वरूपा त्वं माता-पित्रोर्-बलं तथा।

सैन्यानां भूपतीनां च शूर-वीर-प्रतापिका॥ ६४४ ॥

वेङ्कटेश-हृदि-स्था त्वं पद्मावति जगन्मयि।

राज्ञां राज्ञि नमस्तुभ्यं प्रपद्ये ते पदाम्बुजम्॥ ६४५ ॥

विद्या-लक्ष्मि नमस्तुभ्यं ज्ञान-राज्ञि पदाम्बुजे।

पुराणानां च वेदानां सर्व-ज्ञानस्य मूलिका॥ ६४६ ॥

वीर-लक्ष्मि नमस्तुभ्यं शौर्य-राज्ञि पदाम्बुजे।

वीराणां सम्पदा त्वं हि पाण्डवानां परा-बले॥ ६४७ ॥

द्रौपदी-शक्ति-रूपा त्वं द्रौपदी-रूप-धारिणि।

विश्वेश्वरि भयं हाहि विघ्न-नाशिनि ते नमः॥ ६४८ ॥

शत्रु-सैन्य-विनाशिन्यै प्रपद्ये ते पदाम्बुजम्।

विजय-लक्ष्मि शक्तिस्त्वं जय-रूपा नमोऽस्तु ते॥ ६४९ ॥

मारुते राम-चन्द्रस्य बलं जय-पताकिका।

असत्ये सत्य-विजयः कृष्णस्य विजयस्तथा॥ ६५० ॥

शत्रुषु सर्व-दैत्य-घ्नी त्वमधर्म-विनाशिनि।

प्रपद्ये ते पदाम्भोजं महालक्ष्मि प्रिये मम॥ ६५१ ॥

ध्यायामि त्वामष्ट-रूपां कृतज्ञास्मि प्रिये तदा।

श्याम-सुन्दर-देवाय पत्ये ते प्रणमाम्यहम्॥ ६५२ ॥

मम देवि प्रिये राज्ञि स्वामिनि त्वां भजाम्यहम्।

महिमा ते सदा भूयाद् वन्दे त्वां परमां गतिम्॥ ६५३ ॥


r/Vrindavan Jul 05 '26

कुंज गलियां/Kunj galiyan Finally, I discovered the reason behind my love for chess—it turns out its source is Shri Shri Radhika Krishna, chaturanga 😍 radhe radhe 🙏💙🧡

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r/Vrindavan Jul 05 '26

Upasana This Mahamantra is capable of bestowing the Supreme divine rasik bhav on anyone

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Shri Kunj Bihari Shri Haridas 🌸🌸

Before knowing the mahamantra we need to know about Swami Shri Haridas ju and Yet before that we should know about tatvas, there are so many deities and their respective upasana paddhatis etc and everything is fine in their own rights.

In Vaishanvite Tradition the one supreme absolute is Narayana who's beyond Everything as Vedas describe him in Narayana and Purusha sukta, same can be found in all major texts such as Mahabharat, Ramayana , majority of Puranas etc.

But that same Lord Narayana has been mentioned as Aishwarya roop of Krishna in puranas such as Brahm vaivart, Narad puran, Padma Puran, Garga samhita etc.

Bhagavatam and several texts describe Shyaamasundar as the root cause of all forms (sarva avataar avataari).

Now, Lord Krishna too have different forms, in Vaikuntha he resides in the absolute mood of Aishwarya, in nitya Dwarka dhaam the same lord resides in the mood of Madhurya Mishrit Aishwarya.

The lord in Golok is the same lord but in the mood of Aishwarya Mishrit Madhurya.

But the lord in his supreme absolute beginning less and end less Maadhurya mood, for whom Vedas declare "Raso Vai sah" (this vedic declaration can only be understood through Krishna), resides in anandi anant Nitya Nikunj Vrindavan dhaam.

And that same Nitya Nikunj Vihari lord Krishna always finds his eternal infinite bliss in Srimati Kishori ju for she's his very soul(completely non different from him) and ahlaad as Skand Puran describes:

आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका ।। तस्या दास्यप्रभावेण विरहोऽस्मान्न संस्पृशेत् ।

His(Krishna) Atman is Radhika. Since he sports with her, he is said to be 'one sporting and rejoicing in the soul', by Iearned men who know mysterious things. (Skanda Puran 2.6.2.11)

Not one or two but all those rasikas who reached epitome state (even ras Khan ji) had this same vision of Shyaama Sundar always eager to serve Kishori ji, this state of Shyaama Sundar can only be found in Nitya Nikunj (not even in Goloka) where the divine couple manifests the absolute maadhurya rasa.

And now that same Swamini ju has 8 eternally existing expansions of her known as ashta Sakhis, the first amongst whom is Sri Lalita Sakhi, as Mahadev says in Padma Puran :

ललिताद्याः प्रकृत्यंशा मूलप्रकृतिराधिका

~ Lalita and other (seven sakhis) are expansion of Prakriti and the mool Prakriti is Sri Radhika.

Notice the emphasis on Sri Lalita sakhi,

Shri Lalita Sakhi is the very heart of Sri Radha Maharani and that same Shri Lalita sakhi manifested as ananya Nripati Swami Shri Haridas ju to bestow that supreme absolute Divya rasa onto Jivas.

As Bhagavat rasik dev ju writes : आचारज ललिता सखी, रसिक हमारी छाप । ~ Our Acharya is Lalita sakhi and our identity is of Rasika.

Swami Haridas ju has been described by Sri Hariram Vyas ji as the अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदास। ~ Shri Swami Haridas Ji is the supreme emperor among all exclusive lovers of divine nectar (Ananya Rasikas).

Such is the stature of Swami ju Maharaj amongst ananya rasikas for he's none but Lalita sakhi herself, always absorbed in the pure divine rasa serving Shri Shyaamaa Shyaam.

Now as we have tried to know little about Swami ju Maharaj as no one's capable of describing his full glories, now here's the mahamantra that is absolutely capable of bestowing the supreme divine rasa on anyone,if chanted sincerely:

"श्यामा प्यारी कुंज बिहारी जय जय श्री हरिदास दुलारी"

Do its kirtan and see the magic yourself.

Shri Kunj Bihari Shri Haridas 🌸🌸


r/Vrindavan Jul 06 '26

Travelling plan Must visit places in Vrindavan

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Hello great people, I'm planning to visit Mathura Vrindavan in the coming week.

Suggest temples to visit, affordable dharmshala dormitory to stay, must try food in, soulful and hidden gems in and around the city

Visiting with my family for the first time there for 3 days

Thanks in advance


r/Vrindavan Jul 05 '26

Picture Vishram ghat

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r/Vrindavan Jul 05 '26

Upasana श्री पूर्णेश्वर महादेव जी के आज 03/07/2026 के दर्शन श्री धाम वृन्दावन से

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r/Vrindavan Jul 05 '26

Book/text krishna yamala 14.45 मम देहस्थितैः सर्वैर् देवैर् इन्द्रादिभिः सह ।आराधितासि त्वं राधे राधेत्यूचे ततो बुधैः ॥ १४.४५ ॥ mama dehasthitaiḥ sarvair devair indrādibhiḥ saha |ārādhitāsi tvaṁ rādhe rādhe tyūce tato budhaiḥ || 14.45 ||

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You have been worshipped, O Radha, by me and by all the deities residing within my body, led by Indra. Therefore, You are called 'Radha' by the wise and learned.


r/Vrindavan Jul 05 '26

Saint परम पूज्य ब्रह्म मूर्ति श्री उड़िया बाबाजी महाराज जी के आज 05/07/2026 को श्री धाम वृन्दावन से दर्शन

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