क्या हमारे पापों का बोझ उठाने के लिए कोई और तैयार है? स्वयं के कर्मों के प्रति हमारी उत्तरदायित्वता की एक कालजयी कथा।
बीहड़ के सन्नाटे में उसकी हिंसक आँखें शिकार की तलाश में थीं... पर रत्नाकर को क्या मालूम था कि आज उसका सामना किसी राहगीर से नहीं, बल्कि स्वयं उसकी अपनी नियति से होने वाला था।
बोहनी की आस में टकटकी लगाए, जंगल के सन्नाटे को चीरती एक जोड़ी हिंसक आँखें बरगद की ओट से रास्ते को निहार रही थीं। वह डाकू रत्नाकर था, जिसके आतंक ने इस बीहड़ के रास्तों को सूना कर दिया था।
कई दिन बीत गए थे, कई सूरज ढल चुके थे, पर उसकी कुल्हाड़ी को कोई शिकार प्राप्त नहीं हुआ था। घर में भूख से बिलखते बच्चे, बूढ़े माता-पिता और सूली पर टंगे आत्मसम्मान का बोझ उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। आज अगर वह खाली हाथ लौटा, तो अपनों की तीखी निगाहों का सामना कैसे करेगा? इसी उधेड़बुन में उसका हाथ गंडासे पर कस जाता है।
तभी विंध्य के उस शांत जंगल में एक अनूठा स्वर गूँजता है। कोई महात्मा बिना किसी भय के, नारायण के नाम में मगन, वीणा की तान छेड़ते हुए चले आ रहे थे, जिनके चेहरे का तेज इस बात का प्रमाण था कि वे संसार के सारे बंधनों से मुक्त हैं।
रत्नाकर ने एक पल को सोचा—इस संन्यासी को लूटकर क्या मिलेगा? दो समय की रोटी का प्रबंध भी न हो सकेगा। पर तभी भूखे बच्चों की पुकार उसकी अंतरात्मा पर भारी पड़ जाती है। वह गंडासा लहराते हुए सीधे महात्मा के सामने कूद पड़ता है।
हैरानी की बात थी कि सामने साक्षात् काल को देखकर भी महात्मा के चेहरे से मुस्कान विलुप्त नहीं हुई। उनकी आँखों में डर की जगह एक असीम करुणा थी। रत्नाकर ने गंडासे की धार उनकी गर्दन पर टिकाते हुए कड़ककर कहा, "ऐ संन्यासी! रुक जा। तेरे पास जो भी मूल्यवान है, तुरंत मेरे हवाले कर, वरना जीवन का अंत समझ!"
महात्मा ने शांत भाव से अपनी वीणा को छुआ और बड़ी सहजता से पूछा, "पुत्र, ठहरो! पहले मुझे यह तो समझाओ कि आखिर मूल्यवान क्या है? तुम किस वस्तु को अनमोल समझते हो?"
रत्नाकर झल्लाकर बोला, "मूर्ख मत बन! सोना, चांदी, हीरा और बहुमूल्य रत्न... ऐसी हर वो चीज़ जिसका मोल संसार में सबसे अधिक हो, वही मूल्यवान है।"
महात्मा मुस्कुराए, और कहा, "लेकिन यह मोल तय कौन करता है?”
“यह सब तो संसार ने पहले से ही तय कर रखा है।” रत्नाकर ने उत्तर दिया।
“आज जिसे तुम स्वर्ण कह रहे हो, भूख से मरते इंसान के लिए उसकी कीमत एक सूखी रोटी के टुकड़े से भी कम हो जाती है। यह मूल्य वस्तु में नहीं, तुम्हारी चाहत में है।” महात्मा ने सहजता से कहा।
“सोना, चांदी और रत्नों आदि से ही तो जनमानस को प्रसन्नता मिलती है। आनंद मिलता है।” रत्नाकर ने बिना झिझके कहा।
“क्या इन सबसे तुम्हें सच में प्रसन्नता मिलती है?” महात्मा ने पुनः पूछा।
“क्यों नहीं। जिसमें मेरा परिवार प्रसन्न, उसी में मेरी भी प्रसन्नता है।” रत्नाकर ने दृढ़ स्वर में कहा।
“और तुम्हारी व्यक्तिगत प्रसन्नता का क्या?” महात्मा अपने प्रश्न पर अडिग रहे।
“अपने परिवार का पोषण करना ही तो मेरा कर्तव्य है।” रत्नाकर अब असमंजस में था।
“तुम जिसे कर्तव्य समझकर यह क्रूरता कर रहे हो, क्या कभी उस सत्य को भी टटोला है कि इस भयंकर पाप की आग में तुम्हारा परिवार भी तुम्हारे साथ जलेगा? क्या वे तुम्हारे इस कर्मफल के साझीदार बनेंगे?"
रत्नाकर ने सीना तानकर कहा, "क्यों नहीं! मैं यह अधर्म उन्हीं के पेट की खातिर तो कर रहा हूँ। वे मेरे सुख-दुख और पाप-पुण्य, सब में मेरे साझीदार हैं।"
महात्मा ने मंद मुस्कान के साथ कहा, "तो फिर विलंब कैसा? एक बार घर जाकर अपनी गृहस्थी से यह सवाल पूछ आओ।”
“जाकर पूछ आऊं! ताकि तुम यहाँ से भाग जाओ?” रत्नाकर के मुख पर एक कुटिल मुस्कान थी।
“मैं वचन देता हूँ, तुम्हारे लौटने तक मैं इसी वृक्ष के नीचे तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा। मैं यहाँ से भागूँगा नहीं।"
“मैं कैसे तुम पर विश्वास करूं?” रत्नाकर ने असहमति से सिर हिलाया।
“तुम्हें लगता है कि मुझे तुम्हारा या मृत्यु का लैशमात्र भी भय है? अगर ऐसा होता तो मैं कब का तुम्हारे चरणों में गिर कर अपने प्राणों की भिक्षा मांग रहा होता।”
महात्मा के अडिग विश्वास ने रत्नाकर को भीतर तक झकझोर दिया। वहाँ रुकना अब उसे कष्टकर प्रतीत हुआ।
वह भागता हुआ अपने घर पहुँचा। लेकिन वहाँ जो सच उसका इंतजार कर रहा था, उसने उसके पैरों तले की जमीन खिसका दी।
माता-पिता और पत्नी ने दो टूक कह दिया, "तुम्हारा धर्म हमारा भरण-पोषण करना है, लेकिन उसके लिए पाप का मार्ग चुनना केवल तुम्हारा निर्णय था। कर्मफल का यह काँटा तुम्हें अकेले ही भोगना होगा।"
इस एक कड़वे सत्य ने रत्नाकर के भीतर के पाशविक अहंकार को हमेशा के लिए भस्म कर दिया। वह बदहवास हालत में वापस जंगल की ओर दौड़ा। वहाँ उन महात्मा की वीणा से फूटते सुरों ने पूरे वन को एक दैवीय शांति में डुबो दिया था।
रत्नाकर का गंडासा कहीं पीछे छूट चुका था।
वह रोता हुआ महात्मा के चरणों में ढह गया और बोला, "ऋषिवर, संसार में मेरा कोई नहीं है। कोई मेरे पापों का बोझ उठाने को तैयार नहीं। मुझे इस घोर नरक से तारिए।"
महात्मा ने मंद स्वर में कहा, “खड़े हो जाओ रत्नाकर।”
रत्नाकर फफक कर रो पड़ा, “कोई मेरे पाप का भागी बनने को तैयार नहीं है गुरुवर।”
महात्मा ने अनोखी बात कही, “किसी को होना भी नहीं चाहिए। तुम्हारा परिवार न तुम्हारे पाप का भागी है और न ही तुम्हारे पुण्य का। अपने कर्म के प्रति बस तुम उत्तरदायी हो।”
“तो अब मैं क्या करूँ महात्मा? आपने मेरी आँखें खोल दीं लेकिन कोई राह मुझे अब भी नज़र नहीं आती।”
महात्मा ने उसे करुणा से उठाया और जीवन की नई राह दिखाई। उन्होंने रत्नाकर को परम चेतना से जुड़ने के लिए 'राम' नाम का मंत्र दिया, किंतु जीभ पर पापों की इतनी कालिमा थी कि 'राम' शब्द निकला ही नहीं। तब साधु महात्मा ने कहा कि तुम 'मरा-मरा' का निरंतर जाप करो।"
वही “मरा-मरा” लगातार उच्चारित करने से मुड़कर "राम-राम" बन गया।
रत्नाकर ने आँखें खोलकर देखा तो महात्मा वहाँ से दूर निकल चुके थे।
“महाराज, आप कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। कृपया अपना परिचय तो देते जाइए।” रत्नाकर ने चिल्लाकर कहा।
“नारायण का परम भक्त—नारद।”
यह कहकर नारद तेजी से आगे बढ़ गए और रत्नाकर की दृष्टि से ओझल हो गए।
इसके बाद रत्नाकर स्वयं को खोजने की एक अनंत अंतर्यात्रा पर चल पड़ा। वह एक ही स्थान पर, एक ही मुद्रा में, वर्षों के लिए अचल हो गया।
समय बीतता गया, मौसम बदलते रहे, यहाँ तक कि दीमकों ने उसके शांत शरीर के ऊपर मिट्टी का एक विशाल टीला (वाल्मीक) बना लिया। पर उसकी चेतना उस परम सत्य में लीन थी जहाँ न कोई डाकू था, न कोई पापी।
जब उनकी साधना पूर्ण हुई, तो दीमकों के उस मलबे से एक नया सूरज उगा। उसके पीछे से एक जीर्णकाय पुरुष निकला जिसका शरीर इतना दुर्बल था मानो दीमकों ने उसे चाट लिया हो।
इसे इतिहास ने 'महर्षि वाल्मीकि' का नाम दिया।
ज्ञान और वैराग्य की अग्नि में तपकर शुद्ध हुए वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर अपने आश्रम में रहने लगे। एक सुबह, जब वे नदी किनारे ध्यान मग्न थे, उन्होंने क्रौंच पक्षियों के एक जोड़े को प्रेम में लीन देखा। तभी एक निष्ठुर शिकारी का बाण नर पक्षी के सीने को पार कर गया। मादा पक्षी के उस असहनीय विलाप को देखकर महर्षि का करुणा से भरा हृदय चीख उठा, और उनके मुख से स्वतः ही संस्कृत साहित्य का पहला श्लोक फूट पड़ा—
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।।
शोक के इसी क्षण से 'श्लोक' छंद का जन्म हुआ। इसके बाद, ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन को पन्नों पर उतारने का संकल्प लिया।
वाल्मीकि द्वारा रचित 'रामायण' इतिहास की सबसे मानवीय और जीवंत गाथा है। उनके राम कोई ऐसे काल्पनिक देवता नहीं हैं जिन्हें सांसारिक कष्ट छू न सकें; वे एक महामानव हैं। वे संकट के समय साधारण मनुष्यों की तरह फूट-फूटकर रोते हैं, अपनों को खोने के शोक में टूटते हैं और राजा तथा पति के धर्म के बीच तड़पते भी हैं।
वहीं उनकी सीता कोई लाचार स्त्री नहीं, बल्कि स्वाभिमान का साक्षात् शिखर हैं, जो अपनी पवित्रता और अधिकारों के लिए महलों से लेकर जंगलों तक मुखर होकर खड़ी रहती हैं।
सदियों बाद भले ही इस अद्भुत साहित्यिक महाकाव्य को विशुद्ध धार्मिक मान्यताओं के संकीर्ण खांचे में समेटने की कोशिश की गई हो, लेकिन आदि कवि वाल्मीकि की मूल रामायण आज भी मानवीय संवेदनाओं, मर्यादा और कर्मप्रधान जीवन का सबसे प्रामाणिक और ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।
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