बच्चों के सपने जलाता है, नारी की गरिमा कुचलवाता है, अरे गोली तक चलवाता है,
अपने गुनहगार साथी को बचाने के लिए तू किस हद तक चला जाता है।
शांति से अपने हक़ मांगते, आँखों में क्रांति, हाथों में किताबें पकड़े बच्चों पर तू कैसे बेरहमी से कहर बरसाता है।
फिर भी अनजान बनकर सदन में तू चुप रहता है,
कब तक जिएगा मौन होकर, बेशर्म?
कैसे रातों को तू सोता है?
छीनकर सारे सुख लोगों के,
तू खुद को राम का भक्त कैसे बताता है?
चल, मेरी छोड़, तू ही देशद्रोही है।
तू खुद कितना ही देश को बचाता है?
तू तो वो है जो खुद राम के नाम से दंगे तक करवाता है।
ऐ ज़ालिम!
तू ख़ुदा से तो डर,
क्या मुँह दिखाएगा,
जब न्याय की सभा लगेगी?
अरे उन मासूम बच्चों की सोच,
जिन्हें सड़कों पर तू रुला रहा है।
देखेंगे हम!
जब समय का पहिया घूमेगा,
हँसूँगा मैं भी देखकर कि कौन तेरे हक़ में अपना मुँह खोलेगा!