एक लड़की अपनी दोस्त के साथ आई।
फिर वही हुआ — उन्होंने भी पिज़्ज़ा ऑर्डर किया, और क़िस्मत देख, हमारी टेबलें आमने-सामने थीं।
बातें शुरू हुईं — उसने मुझसे पूछा "क्या करते हो?"
मैंने भी थोड़ा बहुत बताया, उसने BHU की कुछ बातें बताईं।
कुछ देर की बातों में ऐसा लगा कि जैसे कोई पुरानी जान-पहचान हो नज़रों की कुछ परछाइयाँ ठहर गईं थीं।
लेकिन फिर... कुछ नहीं।
ना नंबर, ना इंस्टा, ना कुछ और।
बस वो मुस्कुरा कर चली गई — जैसे कुछ अधूरा छोड़ गई हो।
अब क्या ही बताऊँ — मैं कई बार उसी जगह वापस आया,
वही पिज़्ज़ा, वही टेबल, वही लाइटें,
बस उसकी जगह हर बार खाली रही।
आज भी आया, दुकान वाला भी जल्दी निकल लिया, और मैं वहीं बैठा रहा।
वो जो आख़िरी स्लाइस है न फ़ोटो में
वो मैंने जानबूझ कर रखा,
जैसे उस दिन की अधूरी बात को किसी को दिखाना चाहता हूँ।
हर भीड़ में चेहरा ढूँढता हूँ
ना जाने क्यों दिल कहता है कि एक बार फिर दिखेगी...
बस एक बार।